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Aqib khan
pahli saf men jo khade hain qatl ka insaaf lene
pahli saf men jo khade hain qatl ka insaaf lene | पहली सफ़ में जो खड़े हैं क़त्ल का इंसाफ लेने
- Aqib khan
पहली
सफ़
में
जो
खड़े
हैं
क़त्ल
का
इंसाफ
लेने
गर
जो
मुर्दा
बोलता
होता
तो
फिर
सफ़
साफ
होती
- Aqib khan
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ज़िंदगी
से
बड़ी
सज़ा
ही
नहीं
और
क्या
जुर्म
है
पता
ही
नहीं
Krishna Bihari Noor
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फ़ैसला
बिछड़ने
का
कर
लिया
है
जब
तुम
ने
फिर
मिरी
तमन्ना
क्या
फिर
मिरी
इजाज़त
क्यूँँ
Ambreen Haseeb Ambar
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हमीं
तक
रह
गया
क़िस्सा
हमारा
किसी
ने
ख़त
नहीं
खोला
हमारा
मु'आफ़ी
और
इतनी
सी
ख़ता
पर
सज़ा
से
काम
चल
जाता
हमारा
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Shariq Kaifi
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शौक़,लत,आवारगी,अय्याशी
में
गुज़री
हमारी
ज़िन्दगी
अब
तू
मुनासिब
सी
सज़ा
दे
गिनती
करके
Kartik tripathi
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गर
सज़ा
में
उम्र
भर
की
बा-मशक़्क़त
क़ैद
है
जुर्म
भी
फिर
इश्क़
सा
संगीन
होना
चाहिए
Satyam Shukla
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मुमकिना
फ़ैसलों
में
एक
हिज्र
का
फ़ैसला
भी
था
हमने
तो
एक
बात
की
उसने
कमाल
कर
दिया
Parveen Shakir
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तुम्हारे
ख़त
को
जलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
ये
दिल
बाहर
निकलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
तुम्हारा
फ़ैसला
है
पास
रुकना
या
नहीं
रुकना
मेरी
क़िस्मत
बदलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
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Tanoj Dadhich
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मुन्सिफ़
हो
अगर
तुम
तो
कब
इंसाफ़
करोगे
मुजरिम
हैं
अगर
हम
तो
सज़ा
क्यूँँ
नहीं
देते
Ahmad Faraz
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मिरे
गुनाह
की
मुझ
को
सज़ा
नहीं
देता
मिरा
ख़ुदा
कहीं
नाराज़
तो
नहीं
मुझ
से
Shahid Zaki
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सज़ा
कितनी
बड़ी
है
गाँव
से
बाहर
निकलने
की
मैं
मिट्टी
गूँधता
था
अब
डबलरोटी
बनाता
हूँ
Munawwar Rana
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ज़िन्दगी
भी
उन
किताबों
की
तरह
है
जिनके
हर
इक
पेज
पर
इक
हादसा
है
Aqib khan
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जैसे
ही
होती
है
बरसात
की
आवाजाही
तेज़
हो
जाती
है
जज़्बात
की
आवाजाही
पेड़
पौधों
को
ही
बस
दोष
न
देना
यारों
होती
है
मुझ
में
भी
इक
ज़ात
की
आवाजाही
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Aqib khan
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ओढ़
कर
मसरूफि़यत
आ
तो
गए
हैं
देखना
है
ज़िन्दगी
रोकेगी
कब
तक
Aqib khan
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कौन
किसके
लिए
मरता
है
जहाँ
में
'आकिब'
अपनी
ख़ातिर
ही
मरे
आप
भी
मैं
भी
वो
भी
Aqib khan
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आइने
में
यही
ख़राबी
है
आइना,
आइना
दिखाता
नहीं
Aqib khan
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