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Aqib khan
achhi-khaasi lag rahi thii vo mujhe
achhi-khaasi lag rahi thii vo mujhe | अच्छी-ख़ासी लग रही थी वो मुझे
- Aqib khan
अच्छी-ख़ासी
लग
रही
थी
वो
मुझे
क्यूँँ
ही
देखा
उसको
मेक-अप
के
बिना
- Aqib khan
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किसी
को
घर
से
निकलते
ही
मिल
गई
मंज़िल
कोई
हमारी
तरह
उम्र
भर
सफ़र
में
रहा
Ahmad Faraz
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इश्क़
अगर
बढ़ता
है
तो
फिर
झगड़े
भी
तो
बढ़ते
हैं
आमदनी
जब
बढ़ती
है
तो
ख़र्चे
भी
तो
बढ़ते
हैं
माना
मंज़िल
नहीं
मिली
है
हमको
लेकिन
रोज़ाना
एक
क़दम
उसकी
जानिब
हम
आगे
भी
तो
बढ़ते
हैं
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Tanoj Dadhich
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तन्हा
ही
सही
लड़
तो
रही
है
वो
अकेली
बस
थक
के
गिरी
है
अभी
हारी
तो
नहीं
है
Ali Zaryoun
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आ
रही
है
जो
बहू
सीधी
रहे
माँ
चाहती
जा
रही
बेटी
मगर
चालाक
होनी
चाहिए
Tanoj Dadhich
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न
जाने
कैसी
महक
आ
रही
है
बस्ती
से
वही
जो
दूध
उबलने
के
बाद
आती
है
Munawwar Rana
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ये
शाम
ख़ुशबू
पहन
के
तेरी
ढली
है
मुझ
में
जो
रेज़ा
रेज़ा
मैं
क़तरा
क़तरा
पिघल
रही
हूँ
ख़मोश
शब
के
समुंदरों
में
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Kiran K
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मुसाफ़िरों
के
दिमाग़ों
में
डर
ज़ियादा
है
न
जाने
वक़्त
है
कम
या
सफ़र
ज़ियादा
है
Hashim Raza Jalalpuri
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ज़िंदगी
यूँँ
हुई
बसर
तन्हा
क़ाफ़िला
साथ
और
सफ़र
तन्हा
Gulzar
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बंद
कमरा,
सर
पे
पंखा,
तीरगी
है
और
मैं
एक
लड़ाई
चल
रही
है
ज़िंदगी
है
औऱ
मैं
Shadab Asghar
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आज
भी
शायद
कोई
फूलों
का
तोहफ़ा
भेज
दे
तितलियाँ
मंडला
रही
हैं
काँच
के
गुल-दान
पर
Shakeb Jalali
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समुंदर
में
भी
सहरा
देखना
है
मुझे
महफ़िल
में
तन्हा
देख
लेना
Aqib khan
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उसे
अपना
समझ
बैठे,
मगर
ये
भूल
बैठे
थे
ज़मीं
और
आसमाँ
मिलते
नज़र
आते
हैं
दूरी
से
Aqib khan
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झमाझम
में
कुछ
भी
नहीं
हो
रहा
ये
मौसम
में
कुछ
भी
नहीं
हो
रहा
ले
तो
आए
मुझको
भगा
कर
मगर
रक़म
कम
में
कुछ
भी
नहीं
हो
रहा
नहीं
हो
रहीं
हम
सेे
ग़ज़लें
भी
और
इसी
ग़म
में
कुछ
भी
नहीं
हो
रहा
उधर
दोस्त
चाहें
कहानी
नई
इधर
हम
में
कुछ
भी
नहीं
हो
रहा
मैं
कोशिश
करूँँ?
बोल
कितनी
दफा
याँ
पैहम
में
कुछ
भी
नहीं
हो
रहा
बताया
गया
मर्द
रोते
नहीं
सो
मातम
में
कुछ
भी
नहीं
हो
रहा
ख़बर
है
फ़क़त
वो
भी
झूठी
ख़बर
कि
ऊदम
में
कुछ
भी
नहीं
हो
रहा
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Aqib khan
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कौन
किसके
लिए
मरता
है
जहाँ
में
'आकिब'
अपनी
ख़ातिर
ही
मरे
आप
भी
मैं
भी
वो
भी
Aqib khan
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ज़िंदा
लोगों
से
राब्ता
ही
नहीं
मुर्दे
आ
आके
बात
करते
हैं
Aqib khan
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