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Maheshwar
zakham se dard se raat bhi kaat li
zakham se dard se raat bhi kaat li | ज़ख़्म से दर्द से रात भी काट ली
- Maheshwar
ज़ख़्म
से
दर्द
से
रात
भी
काट
ली
मैंने
फिर
जंग
की
मात
भी
काट
ली
मुझको
तो
जंग
का
शौक़
ही
खा
गया
मैंने
फिर
शौक़
की
लात
भी
काट
ली
अढ़
रहा
था
अना
प्यार
में
हर
दफा
मैंने
फिर
जिस्म
से
जात
भी
काट
ली
रो
रही
थी
तो
फिर
चुप
कराने
के
लिए
चूम
कर
दुख
भरी
बात
भी
काट
ली
अश्क़
के
भेस
में
मौत
जब
आ
पड़ा
मैंने
दोज़ख
में
वो
रात
भी
काट
ली
- Maheshwar
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न
जाने
कैसी
महक
आ
रही
है
बस्ती
से
वही
जो
दूध
उबलने
के
बाद
आती
है
Munawwar Rana
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अभी
से
पाँव
के
छाले
न
देखो
अभी
यारो
सफ़र
की
इब्तिदा
है
Ejaz Rahmani
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न
हम-सफ़र
न
किसी
हम-नशीं
से
निकलेगा
हमारे
पाँव
का
काँटा
हमीं
से
निकलेगा
Rahat Indori
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मैं
तेरे
साथ
सितारों
से
गुज़र
सकता
हूँ
कितना
आसान
मोहब्बत
का
सफ़र
लगता
है
Bashir Badr
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उसे
पागल
बनाती
फिर
रही
हो
जिसे
शौहर
बनाना
चाहिए
था
Arvind Inaayat
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पास
मैं
जिसके
हूँ
वो
फिर
भी,
अच्छा
लड़का
ढूँढ़
रही
है
उसने
लगा
रक्खा
है
चश्मा,
और
वो
चश्मा
ढूँढ़
रही
है
फ़ोन
किया
मैंने
और
पूछा,
अब
तक
घर
से
क्यूँँ
नहीं
निकली
उस
ने
कहा
मुझ
सेे
मिलने
का,
एक
बहाना
ढूँढ़
रही
है
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Tanoj Dadhich
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बहुत
क़रीब
रही
है
ये
ज़िन्दगी
हम
से
बहुत
अज़ीज़
सही
ए'तिबार
कुछ
भी
नहीं
Akhtar Saeed Khan
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वो
राही
हूँ
पलभर
के
लिए,
जो
ज़ुल्फ़
के
साए
में
ठहरा,
अब
ले
के
चल
दूर
कहीं,
ऐ
इश्क़
मेरे
बेदाग
मुझे
।
Raja Mehdi Ali Khan
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अब
उसकी
शादी
का
क़िस्सा
न
छेड़ो
बस
इतना
कह
दो
कैसी
लग
रही
थी
Zubair Ali Tabish
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मुक़र्रर
दिन
नहीं
तो
लम्हा-ए-इमकान
में
आओ
अगर
तुम
मिल
नहीं
सकती
तो
मेरे
ध्यान
में
आओ
बला
की
ख़ूब-सूरत
लग
रही
हो
आज
तो
जानाँ
मुझे
इक
बात
कहनी
थी
तुम्हारे
कान
में..
आओ
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Darpan
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हम
को
तो
बस
प्यास
दिखाना
होता
था
उस
को
दरिया
बन
कर
आना
होता
था
मुझ
को
कोई
धुन
जब
सुननी
होती
थी
उस
को
अपना
आँख
दिखाना
होता
था
जब
जब
भी
मुझ
को
मरने
की
ख़्वाहिश
थी
उसने
मुझको
आग
लगाना
होता
था
हम
को
तो
बस
पेड़
लगाने
होते
थे
तुम
को
भी
बस
दश्त
जलाना
होता
था
तुम
भी
हर
पल
मुश्किल
में
ही
रहते
थे
तुमने
भी
फिर
तीर
चलाना
होता
था
मेरे
घर
पर
इक
दरिया
जो
रहती
थी
उस
को
सब
ने
आग
बनाना
होता
था
मेरी
दर
दीवारें
चीखा
करती
थीं
उनको
जब
वहशत
में
आना
होता
था
उस
लड़की
की
बातें
मुझ
पर
जादू
थीं
हर
उस
पल
जब
जब
मैं
काना
होता
था
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उसके
आँखों
की
अश्कें
भी
गन्नों
के
रस
से
शीरीं
थी
Maheshwar
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झाड़के
गर्द
अपने
पल्लू
से
वो
सितारे
बना
चुकी
होगी
Maheshwar
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धीरे
धीरे
निकल
गया
हूँ
मैं
मोम
जैसे
पिघल
गया
हूँ
मैं
ख़ुद
की
है
ही
नहीं
क़दर
मुझ
को
उसके
जैसा
ही
ढल
गया
हूँ
मैं
मैं
सँभलते
हुए
चला
लेकिन
जाने
कैसे
फिसल
गया
हूँ
मैं
कहने
पर
उसके
रो
रहे
हो
तुम
हँसते
आँखों
को
मल
गया
हूँ
मैं
इक
सफ़र
भी
था
मेरा
ही
मुझ
तक
दूर
ख़ुद
से
निकल
गया
हूँ
मैं
रौशनी
चीख़ती
थी
साए
पर
रौशनी
ही
निगल
गया
हूँ
मैं
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Maheshwar
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याद
उसको
किया
नहीं
करते
रात
दिन
भी
जगा
नहीं
करते
नींद
की
मौत
हो
चुकी
है
ना
ख़्वाब
की
फिर
दु'आ
नहीं
करते
इक
कयामत
गुज़र
गई
कल
शब
मौत
से
अब
डरा
नहीं
करते
रात
को
क्यूँ
गले
लगाए
हो
रौशनी
से
गिला
नहीं
करते
धूल
जुगनू
बना
दिया
मैंने
कहते
थे
मो'जिज़ा
नहीं
करते
यार
सुन
आफ़ताब
है
तू
भी
आँधियों
से
बुझा
नहीं
करते
जान
लेगी
अदीब
ये
तल्ख़ी
तल्ख़
बातें
किया
नहीं
करते
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Maheshwar
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