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Maheshwar
yaad usko kiya nahin karte
yaad usko kiya nahin karte | याद उसको किया नहीं करते
- Maheshwar
याद
उसको
किया
नहीं
करते
रात
दिन
भी
जगा
नहीं
करते
नींद
की
मौत
हो
चुकी
है
ना
ख़्वाब
की
फिर
दु'आ
नहीं
करते
इक
कयामत
गुज़र
गई
कल
शब
मौत
से
अब
डरा
नहीं
करते
रात
को
क्यूँ
गले
लगाए
हो
रौशनी
से
गिला
नहीं
करते
धूल
जुगनू
बना
दिया
मैंने
कहते
थे
मो'जिज़ा
नहीं
करते
यार
सुन
आफ़ताब
है
तू
भी
आँधियों
से
बुझा
नहीं
करते
जान
लेगी
अदीब
ये
तल्ख़ी
तल्ख़
बातें
किया
नहीं
करते
- Maheshwar
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वहम
मुझको
ये
भाता
है
अभी
मेरी
दीवानी
है
मगर
मेरी
दीवानी
थी
मियाँ
पहले
बहुत
पहले
Anand Raj Singh
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मैं
ख़ुद
भी
यार
तुझे
भूलने
के
हक़
में
हूँ
मगर
जो
बीच
में
कम-बख़्त
शा'इरी
है
ना
Afzal Khan
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कुछ
तो
कर
आदाब-ए-महफ़िल
का
लिहाज़
यार
ये
पहलू
बदलना
छोड़
दे
Waseem Barelvi
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पहले
रूठा
यार
मनाना
होता
है
फिर
कोई
त्योहार
मनाना
होता
है
Hasan Raqim
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यार
माँगा
था
मोहब्बत
की
दु'आ
माँगी
थी
और
इस
दिल
के
हिफ़ाज़त
की
दु'आ
माँगी
थी
अब
तो
कुछ
उसका
बिगाड़ा
भी
नहीं
जा
सकता
मैंने
ख़ुद
उसके
सलामत
की
दु'आ
माँगी
थी
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Ritesh Rajwada
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इश्क़
के
रंग
में
ऐ
मेरे
यार
रंग
आया
फिर
आज
रंगों
का
तेहवार
रंग
हो
गुलाबी
या
हो
लाल
पीला
हरा
आ
लगा
दूँ
तुझे
भी
मैं
दो
चार
रंग
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Afzal Ali Afzal
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लबों
के
पास
आकर
मुड़
गए
फिर
ग़ज़ब
का
दर्द
देते
हो
मियाँ
तुम
Ashish Awasthi
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तिलिस्म-ए-यार
ये
पहलू
निकाल
लेता
है
कि
पत्थरों
से
भी
ख़ुशबू
निकाल
लेता
है
है
बे-लिहाज़
कुछ
ऐसा
की
आँख
लगते
ही
वो
सर
के
नीचे
से
बाजू
निकाल
लेता
है
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Tehzeeb Hafi
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बहुत
चल
बसे
यार
ऐ
ज़िंदगी
कोई
दिन
की
मेहमान
तू
रह
गई
Dagh Dehlvi
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तू
उसके
दिल
में
जगह
चाहता
है
यार
जो
शख़्स
किसी
को
देता
नहीं
अपने
साथ
वाली
जगह
Umair Najmi
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झाड़के
गर्द
अपने
पल्लू
से
वो
सितारे
बना
चुकी
होगी
Maheshwar
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बाल्टी
भर
गई
पसीने
से
आग
बुझती
नहीं
कमीने
से
मैं
दिखा
गर
कभी
तो
हैरत
कर
मैं
नहीं
हूँ
कहीं
महीने
से
हाथ
मुँह
में
घुसा
दिया
मैंने
खींच
डाला
ये
दिल
भी
सीने
से
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Maheshwar
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धीरे
धीरे
निकल
गया
हूँ
मैं
मोम
जैसे
पिघल
गया
हूँ
मैं
ख़ुद
की
है
ही
नहीं
क़दर
मुझ
को
उसके
जैसा
ही
ढल
गया
हूँ
मैं
मैं
सँभलते
हुए
चला
लेकिन
जाने
कैसे
फिसल
गया
हूँ
मैं
कहने
पर
उसके
रो
रहे
हो
तुम
हँसते
आँखों
को
मल
गया
हूँ
मैं
इक
सफ़र
भी
था
मेरा
ही
मुझ
तक
दूर
ख़ुद
से
निकल
गया
हूँ
मैं
रौशनी
चीख़ती
थी
साए
पर
रौशनी
ही
निगल
गया
हूँ
मैं
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Maheshwar
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उसके
आँखों
की
अश्कें
भी
गन्नों
के
रस
से
शीरीं
थी
Maheshwar
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ज़ख़्म
से
दर्द
से
रात
भी
काट
ली
मैंने
फिर
जंग
की
मात
भी
काट
ली
मुझको
तो
जंग
का
शौक़
ही
खा
गया
मैंने
फिर
शौक़
की
लात
भी
काट
ली
अढ़
रहा
था
अना
प्यार
में
हर
दफा
मैंने
फिर
जिस्म
से
जात
भी
काट
ली
रो
रही
थी
तो
फिर
चुप
कराने
के
लिए
चूम
कर
दुख
भरी
बात
भी
काट
ली
अश्क़
के
भेस
में
मौत
जब
आ
पड़ा
मैंने
दोज़ख
में
वो
रात
भी
काट
ली
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Maheshwar
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