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Manish
gunah kar KHuda se chhupaate hain log
gunah kar KHuda se chhupaate hain log | गुनह कर ख़ुदास छुपाते हैं लोग
- Manish
गुनह
कर
ख़ुदास
छुपाते
हैं
लोग
मिले
दर्द
तो
बिलबिलाते
हैं
लोग
- Manish
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लोग
हम
सेे
सीखते
हैं
ग़म
छुपाने
का
हुनर
आओ
तुमको
भी
सिखा
दें
मुस्कुराने
का
हुनर
क्या
ग़ज़ब
है
तजरबे
की
भेंट
तुम
ही
चढ़
गए
तुम
से
ही
सीखा
था
हमने
दिल
दुखाने
का
हुनर
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Kashif Sayyed
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दर्द
मिन्नत-कश-ए-दवा
न
हुआ
मैं
न
अच्छा
हुआ
बुरा
न
हुआ
Mirza Ghalib
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यतीमों
की
तरह
बस
पाल
रक्खा
है
इन्हें
हमने
हमें
जो
दुख
मिले
हैं
वो
हमारे
दुख
नहीं
लगते
किसी
की
आँख
में
रहकर
किसी
के
ख़्वाब
देखे
हैं
हजारों
कोशिशें
की
पर
किनारे
दुख
नहीं
लगते
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Rohit Gustakh
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मैं
शा'इर
हूँ
मोहब्बत
का
मिरे
दुख
भी
रसीले
हैं
Farhat Abbas Shah
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कुल
जोड़
घटाकर
जो
ये
संसार
का
दुख
है
उतना
तो
मिरे
इक
दिल-ए-बेज़ार
का
दुख
है
शाइर
हैं
तो
दुनिया
से
अलग
थोड़ी
हैं
लोगों
सबकी
ही
तरह
हमपे
भी
घर
बार
का
दुख
है
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Ashutosh Vdyarthi
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ग़म-ए-दुनिया
भी
ग़म-ए-यार
में
शामिल
कर
लो
नश्शा
बढ़ता
है
शराबें
जो
शराबों
में
मिलें
Ahmad Faraz
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कभी
हँसता
हूँ
तो
आँखें
कभी
मैं
नम
भी
रखता
हूँ
हर
इक
मुस्कान
के
पीछे
हज़ारों
ग़म
भी
रखता
हूँ
शिफ़ा
भी
दे
नहीं
सकता
मुझे
कोई
मेरा
अपना
नतीजन
मैं
मिरे
ज़ख़्मों
का
ख़ुद
मरहम
भी
रखता
हूँ
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Shubham Dwivedi
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ज़ख़्म
है
दर्द
है
दवा
भी
है
जैसे
जंगल
है
रास्ता
भी
है
यूँँ
तो
वादे
हज़ार
करता
है
और
वो
शख़्स
भूलता
भी
है
हम
को
हर
सू
नज़र
भी
रखनी
है
और
तेरे
पास
बैठना
भी
है
यूँँ
भी
आता
नहीं
मुझे
रोना
और
मातम
की
इब्तिदा
भी
है
चूमने
हैं
पसंद
के
बादल
शाम
होते
ही
लौटना
भी
है
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Karan Sahar
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ज़रा
सा
ग़म
हुआ
और
रो
दिए
हम
बड़ी
नाज़ुक
तबीअत
हो
गई
है
Shahzad Ahmad
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कहीं
से
दुख
तो
कहीं
से
घुटन
उठा
लाए
कहाँ-कहाँ
से
न
दीवानापन
उठा
लाए
अजीब
ख़्वाब
था
देखा
के
दर-ब-दर
हो
कर
हम
अपने
मुल्क
से
अपना
वतन
उठा
लाए
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Farhat Abbas Shah
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इश्क़
में
लो
चोट
खाना
आ
गया
दर्द
को
दिल
से
मिटाना
आ
गया
सब
दु'आ
माँ
की
हिफ़ाज़त
कर
रही
और
फ़रिश्ता
जी
बचाने
आ
गया
ठोकरों
से
ज़िंदगी
की
सीख
ली
हाथ
दुश्मन
से
मिलाना
आ
गया
प्यार
भी
तो
बंदगी
है
कुछ
नहीं
यह
परस्तिश
भी
निभाना
आ
गया
हमको
उल्फ़त
के
मुबारक
ग़म
सभी
ज़ख़्म
खा
कर
मुस्कुराना
आ
गया
दर्द
का
रिश्ता
है
क्या
इक
दोस्त
से
दोस्त
ग़म
में
यह
बताने
आ
गया
मैं
सुनाऊँ
चल
तुझे
अच्छी
ग़ज़ल
सामने
चेहरा
सुहाना
आ
गया
ज़िंदगी
लो
फिर
मुकम्मल
हो
गई
जब
से
हम
को
ज़ख़्म
खाना
आ
गया
हम
तेरी
जब
से
गली
रहने
लगे
प्यार
का
क़िस्सा
सुनाना
आ
गया
वक़्त
अच्छा
या
बुरा
ही
क्यूँ
न
हो
हम
को
तो
हॅंस
कर
बिताना
आ
गया
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Manish
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इक
समुंदर
ने
डुबोने
की
मुझे
साज़िश
की
है
मैंने
बन
तूफ़ान
फिर
से
उठने
की
कोशिश
की
है
Manish
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परस्तिश
नेक
हो
मंदिर
अज़ानों
से
बरसती
हैं
दुआएँ
आसमानों
से
Manish
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तुम
कहो
जान
जान
दे
देंगे
इश्क़
में
इम्तिहान
दे
देंगे
खोल
कर
देख
ज़ेहन
का
पिंजरा
पंख
को
आसमान
दे
देंगे
हों
मुकम्मल
तेरी
ग़ज़ल
सारी
शे'र
पर
तेरे
शान
दे
देंगे
कोई
क़ीमत
तेरी
न
कर
पाए
ठीक
ऐसी
ज़बान
दे
देंगे
तु
सलामत
रहे
दु'आ
है
यह
गुल
की
रब
को
दुकान
दे
देंगे
इश्क़
की
सब
सदा
सुनाई
दे
प्यार
से
भर
के
कान
दे
देंगे
अर्श
से
फिर
तुझे
न
गिरने
दे
एक
ऐसी
उड़ान
दे
देंगे
जो
भी
कहना
ग़ज़ल
में
कह
देना
दाद
सब
साहिबान
दे
देंगे
कोई
काॅंटा
न
छू
सके
तुम
को
हम
दिल-ए-पायदान
दे
देंगे
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Manish
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ग़म
मेरी
ज़िंदगी
की
कहानी
में
है
इस
सबब
से
ग़ज़ल
यह
रवानी
में
है
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