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ATUL SINGH
bichhad kar tumse vo din zindagi men laut aa.e hain
bichhad kar tumse vo din zindagi men laut aa.e hain | बिछड़ कर तुम सेे वो दिन ज़िन्दगी में लौट आए हैं
- ATUL SINGH
बिछड़
कर
तुम
सेे
वो
दिन
ज़िन्दगी
में
लौट
आए
हैं
तुम्हें
अब
चाँद
में
हम
देखते
हैं
और
सो
जाते
हैं
- ATUL SINGH
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अभी
तो
जान
कहता
फिर
रहा
है
तू
तुझे
हम
हिज्र
वाले
साल
पूछेंगे
Parul Singh "Noor"
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पहले
लगा
था
हिज्र
में
जाएँगे
जान
से
पर
जी
रहे
हैं
और
भी
हम
इत्मीनान
से
Ankit Maurya
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हिज्र
में
इश्क़
यूँँ
रखा
आबाद
हिचकियांँ
तन्हा
तन्हा
लेते
रहे
Siraj Tonki
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हिज्र
की
रातें
इतनी
भारी
होती
हैं
जैसे
छाती
पर
ऐरावत
बैठा
हो
Tanoj Dadhich
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मर्म
हँसने
का
समझ
पाए
ज़रा
हम
देर
से
वस्ल
जिसको
कह
रहे
थे
हिज्र
की
बुनियाद
थी
Atul K Rai
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मेरे
मिज़ाज
की
उसको
ख़बर
नहीं
रही
है
ये
बात
मेरे
गले
से
उतर
नहीं
रही
है
ये
रोने-धोने
का
नाटक
तवील
मत
कर
अब
बिछड़
भी
जाए
तू
मुझ
सेे
तो
मर
नहीं
रही
है
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Ashutosh Vdyarthi
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हिज्र
में
ख़ुद
को
तसल्ली
दी
कहा
कुछ
भी
नहीं
दिल
मगर
हँसने
लगा
आया
बड़ा
कुछ
भी
नहीं
Afkar Alvi
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तुम
सेे
बिछड़
जाने
का
ख़याल
अच्छा
है
क्योंकि
अभी
मेरा
भी
हाल
अच्छा
है
उसने
पूछा
तुम्हें
कितनी
महोब्बत
है
मुझ
सेे
मैंने
कहा
मालूम
नहीं
सवाल
अच्छा
है
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karan singh rajput
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मिरी
ज़िंदगी
तो
गुज़री
तिरे
हिज्र
के
सहारे
मिरी
मौत
को
भी
प्यारे
कोई
चाहिए
बहाना
Jigar Moradabadi
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कभी
न
लौट
के
आया
वो
शख़्स,
कहता
था
ज़रा
सा
हिज्र
है
बस
सरसरी
बिछड़ना
है
Subhan Asad
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गुल
कि
गुलशन
को
सुना
है
तुम
चुराना
चाहते
हो
आज
फिर
मुझ
को
गले
से
तुम
लगाना
चाहते
हो
ATUL SINGH
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तुम
धरा
पर
बैठ
कर
सपने
गगन
के
पालते
हो
है
विजय
की
चाह
तो
क्यूँ
काम
कल
पर
टालते
हो
और
अंदाज़ा
नदी
का
छोर
पर
मिलता
नहीं
है
कूद
कर
देखो
न
डर
क्यूँ
डूबने
का
पालते
हो
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ATUL SINGH
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इश्क़
सबको
है
मगर
सब
तो
वफ़ा
करते
नहीं
हैं
टूटता
दिल
है
मगर
सब
प्यार
में
मरते
नहीं
हैं
ATUL SINGH
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सियासतदार
थे
वो
यार
फ़ितरत
थी
मुकर
जाना
कि
पागल
थे
लगा
बैठे
वफ़ा
की
आरज़ू
उन
सेे
ATUL SINGH
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सभी
को
इश्क़
यारी
लग
रही
है
सो
ये
आदत
तुम्हारी
लग
रही
है
बिछड़ने
का
इरादा
कैसे
कर
लूँ
तू
अब
भी
उतनी
प्यारी
लग
रही
है
वो
मिलता
है
मगर
नज़रें
झुकाकर
बदन
की
पहरे-दारी
लग
रही
है
ये
किसने
हाल
पूछा
है
हमारा
ये
किसको
ग़म-गुसारी
लग
रही
है
नहीं
ये
हिज्र
के
आँसू
नहीं
हैं
ये
कोई
बर्फ़बारी
लग
रही
है
कोई
शीशा
यहाँ
टूटा
नहीं
है
मुझे
ये
दिल
फ़िगारी
लग
रही
है
वो
फिर
है
तोड़ने
निकली
दिलों
को
अतुल
बारी
तुम्हारी
लग
रही
है
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ATUL SINGH
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