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Zohair Ahmad Sahil
Raat dhal jayegi tab laut ke ghar jaunga
रात ढल जाएगी तब लौट के घर जाऊँगा
- Zohair Ahmad Sahil
रात
ढल
जाएगी
तब
लौट
के
घर
जाऊँगा
क़ुर्ब-ए-तन्हाई
से
वरना
मैं
बिखर
जाऊँगा
बस
यही
सोच
के
सूरज
की
तरह
तन्हा
हूँ
ग़म
के
शोलों
में
पिघल
कर
मैं
निखर
जाऊँगा
तू
मिरा
है
तो
मिरे
सामने
हर
पल
रहना
तूने
मुँह
मोड़
लिया
गर
तो
किधर
जाऊँगा
- Zohair Ahmad Sahil
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दुनिया
बदल
रही
है
नगरी
ये
चल
रही
है
सबको
बनाकर
अपना
बातों
से
जल
रही
है
रातों
में
हर
दिए
की
लौ
भी
दहल
रही
है
जो
ज़िंदगी
थी
मेरी
लड़की
फिसल
रही
है
बर्बाद
करके
मुझको
ख़ुद
तो
सँभल
रही
है
यादों
के
इस
चमन
में
कितना
वो
ढल
रही
है
ख़ुशियाँ
मना
रही
थी
मुझ
को
निगल
रही
है
'जोहैर'
क्या
बताएँ
अब
वो
पिघल
रही
है
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उस
दिल
में
मैं
बसा
नहीं
क्या
फ़र्ज़
की
अदा
नहीं
वो
कहती
हैं
वफ़ा
नहीं
क्या
मर्ज़
की
दवा
नहीं
ग़म
तो
बहुत
मिले
मगर
ये
ज़ख़्म
तो
सिला
नहीं
तकलीफ़
क्या
कहें
मगर
उस
रस्ते
से
गिला
नहीं
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दिल
एक
तो
फ़ुन्कारी
है
जिस
पर
शरारत
तारी
है
ये
जो
शिकारी
हैं
नए
इनकी
सदाक़त
प्यारी
है
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मेरा
इस
तरह
तू
भला
कर
गया
मेरे
दिल
के
ग़म
की
दवा
कर
गया
न
जाने
गिरा
दिल
में
क्या
दोस्तों
कोई
फिर
से
आँसू
बहाकर
गया
मकीं
था
जो
दिल
में
बुलाओ
उसे
जो
हर
बात
दिल
में
छुपा
कर
गया
दिखाऊँ
मैं
क्या
दर्द
अपना
तुझे
मुझे
हिज्र
तेरा
फ़ना
कर
गया
जहाँ
एक
फंदा
लगा
है
नया
वहीं
पैर
अपना
फँसा
कर
गया
कहानी
वफ़ा
की
अधूरी
रही
यूँँॅं
ही
बस
वो
बातें
बना
कर
गया
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Zohair Ahmad Sahil
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हमें
जी
भर
के
पीने
दो
कुछ
और
दिन
मुझको
जीने
दो
ये
ज़ख़्म-ए-हिज्र
है
यारा
इसे
कुछ
और
सीने
दो
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Zohair Ahmad Sahil
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