inhi sukhe hue maidaanon men | इन्ही सूखे हुए मैदानों में

  - Zahid Dar
इन्हीसूखेहुएमैदानोंमें
अबजहाँधूपकीलहरोंकेसिवाकुछभीनहीं
सब्ज़लहरातेहुएखेतहुआकरतेथे
लोगआबादथेपेड़ोंकीघनीछाँवमें
महफ़िलेंजमतीथींअफ़्सानेसुनेजातेथे
आजवीरानमकानोंमेंहवाचीख़तीहै
धूलमेंउड़तेकिताबोंकेवरक़
किसकीयादोंकेवरक़किसकेख़यालोंकेवरक़
मुझसेकहतेहैंकिरहजाओयहीं
औरमैंसोचताहूँसिर्फ़अँधेराहैयहाँ
फिरहवाआतीहैदीवानीहवा
औरकहतीहै:नहींसिर्फ़अँधेरातोनहीं
यादहैंमुझकोवोलम्हेजिनमें
लोगआज़ादथेऔरज़िंदाथे
आओमैंतुमकोदिखाऊँवोमक़ाम.....
एकवीरानजगहईंटोंकाअम्बारनहींकुछभीनहीं
औरवोकहतीहैयेप्यारकामरकज़थाकभी
किसकीयादआएमुझेकिसकीबताओकिसकी!
औरअबचुपहैहवाचुपहैज़मीं
बोलवक़्त!कहाँहैंवोलोग
जिनकोवोयादहैंजिनकीयादें
इनहवाओंमेंपरेशानहैंआज
  - Zahid Dar
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