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Zafar Iqbal
ab ke is bazm men kuchh apna pata bhi dena
ab ke is bazm men kuchh apna pata bhi dena | अब के इस बज़्म में कुछ अपना पता भी देना
- Zafar Iqbal
अब
के
इस
बज़्म
में
कुछ
अपना
पता
भी
देना
पाँव
पर
पाँव
जो
रखना
तो
दबा
भी
देना
- Zafar Iqbal
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मुझ
सेे
होकर
के
ही
बे-ज़ार
चले
जाते
हैं
मेरी
महफ़िल
से
मेरे
यार
चले
जाते
हैं
मुझको
मालूम
है
रहता
नहीं
है
अब
वो
वहाँँ
साल
में
फिर
भी
हम
इक
बार
चले
जाते
हैं
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Dipendra Singh 'Raaz'
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मुझे
अँधेरे
से
बात
करनी
है
सो
करा
दो,
दिया
बुझा
दो
कुछ
एक
लम्हों
को
रौशनी
का
गला
दबा
दो,
दिया
बुझा
दो
रिवाज़-ए-महफ़िल
निभा
रहा
हूँ
बता
रहा
हूँ
मैं
जा
रहा
हूँ
मुझे
विदा
दो,
जो
रोना
चाहे
उन्हें
बुला
दो,
दिया
बुझा
दो
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Vikram Gaur Vairagi
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एक
महफ़िल
में
कई
महफ़िलें
होती
हैं
शरीक
जिस
को
भी
पास
से
देखोगे
अकेला
होगा
Nida Fazli
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हमीं
हैं
सोज़
हमीं
साज़
हैं
हमीं
नग़्मा
ज़रा
सँभल
के
सर-ए-बज़्म
छेड़ना
हम
को
Moin Ahsan Jazbi
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बात
करनी
मुझे
मुश्किल
कभी
ऐसी
तो
न
थी
जैसी
अब
है
तेरी
महफ़िल
कभी
ऐसी
तो
न
थी
Bahadur Shah Zafar
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ज़ेहन
से
यादों
के
लश्कर
जा
चुके
वो
मेरी
महफ़िल
से
उठ
कर
जा
चुके
मेरा
दिल
भी
जैसे
पाकिस्तान
है
सब
हुकूमत
करके
बाहर
जा
चुके
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Tehzeeb Hafi
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महफ़िल
में
तेरी
यूँँ
ही
रहे
जश्न-ए-चरागाँ
आँखों
में
ही
ये
रात
गुज़र
जाए
तो
अच्छा
Sahir Ludhianvi
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तेरे
होते
हुए
महफ़िल
में
जलाते
हैं
चराग़
लोग
क्या
सादा
हैं
सूरज
को
दिखाते
हैं
चराग़
Ahmad Faraz
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तुम
हुस्न
की
ख़ुद
इक
दुनिया
हो
शायद
ये
तुम्हें
मालूम
नहीं
महफ़िल
में
तुम्हारे
आने
से
हर
चीज़
पे
नूर
आ
जाता
है
Sahir Ludhianvi
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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मौत
के
साथ
हुई
है
मिरी
शादी
सो
'ज़फ़र'
उम्र
के
आख़िरी
लम्हात
में
दूल्हा
हुआ
मैं
Zafar Iqbal
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काम
आई
न
कुछ
दानिश-ओ-दानाई
हमारी
हारी
है
तेरे
झूठ
से
सच्चाई
हमारी
यूँँ
है
कि
यहाँ
नाम-ओ-निशाँ
तक
नहीं
तेरा
और
तुझ
से
भरी
रहती
है
तन्हाई
हमारी
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Zafar Iqbal
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बदन
का
सारा
लहू
खिंच
के
आ
गया
रुख़
पर
वो
एक
बोसा
हमें
दे
के
सुर्ख़-रू
है
बहुत
Zafar Iqbal
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तुझ
को
मेरी
न
मुझे
तेरी
ख़बर
जाएगी
ईद
अब
के
भी
दबे
पाँव
गुज़र
जाएगी
Zafar Iqbal
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ख़ुदा
को
मान
कि
तुझ
लब
के
चूमने
के
सिवा
कोई
इलाज
नहीं
आज
की
उदासी
का
Zafar Iqbal
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