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Zeeshan kaavish
gul bhi ho saka hai aur jaam bhi ho saka hai
gul bhi ho saka hai aur jaam bhi ho saka hai | गुल भी हो सकता है और जाम भी हो सकता है
- Zeeshan kaavish
गुल
भी
हो
सकता
है
और
जाम
भी
हो
सकता
है
हुस्न
का
तेरे
कोई
नाम
भी
हो
सकता
है
अपने
किरदार
से
ऐ
नाम
कमाने
वाले
तेरी
ख़ातिर
कोई
बदनाम
भी
हो
सकता
है
- Zeeshan kaavish
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ग़रीबी
ओढ़ती
है
सिर
पे
चादर
अमीरी
जिस्म
ढकती
क्यूँ
नहीं
है
Mohd Arham
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मुझे
चाह
थी
किसी
और
की,
प
मुझे
मिला
कोई
और
है
मेरी
ज़िन्दगी
का
है
और
सच,
मेरे
ख़्वाब
सा
कोई
और
है
तू
क़रीब
था
मेरे
जिस्म
के,
बड़ा
दूर
था
मेरी
रूह
से
तू
मेरे
लिए
मेरे
हमनशीं
कोई
और
था
कोई
और
है
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Avtar Singh Jasser
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जला
है
जिस्म
जहाँ
दिल
भी
जल
गया
होगा
कुरेदते
हो
जो
अब
राख
जुस्तजू
क्या
है
Mirza Ghalib
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किसी
कली
किसी
गुल
में
किसी
चमन
में
नहीं
वो
रंग
है
ही
नहीं
जो
तिरे
बदन
में
नहीं
Farhat Ehsaas
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गुजर
चुकी
जुल्मते
शब-ए-हिज्र,
पर
बदन
में
वो
तीरगी
है
मैं
जल
मरुंगा
मगर
चिरागों
के
लो
को
मध्यम
नहीं
करूँगा
यह
अहद
लेकर
ही
तुझ
को
सौंपी
थी
मैंने
कलबौ
नजर
की
सरहद
जो
तेरे
हाथों
से
कत्ल
होगा
मैं
उस
का
मातम
नहीं
करूँगा
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Tehzeeb Hafi
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मैंने
ख़्वाबों
में
भी
तेरे
जिस्म
की
ख़्वाहिश
न
रक्खी
गर
तुझे
यूँँ
प्यार
कोई
और
कर
पाए
तो
कहना
Harsh saxena
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जब
से
तूने
ये
बोला
था
"बदन
का
क्या
है
मिट्टी
है"
तब
से
तेरी
पीठ
पे
मुझको
हरसिंगार
उगाने
थे
Siddharth Saaz
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काम
आया
तिरंगा
कफ़न
के
लिए
कोई
क़ुर्बां
हुआ
था
वतन
के
लिए
सोचो
क्या
कर
लिया
तुमने
जी
कर
के
दोस्त
नस
भी
काटी
तो
बस
इक
बदन
के
लिए
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Neeraj Neer
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तमाम
जिस्म
को
आँखें
बना
के
राह
तको
तमाम
खेल
मुहब्बत
में
इंतिज़ार
का
है
Munawwar Rana
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जिस्म
के
पार
जाना
पड़ा
था
कभी
इश्क़
कर
के
हुई
बंदगी
की
समझ
Neeraj Neer
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हम
को
इस
जाम
में
नहाने
दो
अपनी
आँखों
में
डूब
जाने
दो
आप
के
रुख़
पे
क्यूँँ
उदासी
है
अपने
होंठों
को
मुस्कुराने
दो
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Zeeshan kaavish
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मुस्कुराकर
गुज़र
गया
कोई
मुझपे
जादू
सा
कर
गया
कोई
पहले
तन्हाइयों
से
डरता
था
अब
ज़माने
से
डर
गया
कोई
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Zeeshan kaavish
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तुझे
ख़बर
भी
है
ऐ
बे-वफ़ा
हज़ारों
ने
हयात
काट
दी
रो
रो
के
ग़म
के
मारों
ने
मिलूँ
मैं
चाँद
से
अपने
तो
किस
तरह
से
मिलूँ
फ़लक
को
घेर
लिया
है
कई
सितारों
ने
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Zeeshan kaavish
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ऐसी
हालत
नहीं
हुई
होती
गर
मुहब्बत
नहीं
हुई
होती
ज़िंदगी
किस
तरह
बसर
करते
तेरी
चाहत
नहीं
हुई
होती
हम
दीवानों
पे
वो
ही
हँसता
है
जिसको
उल्फ़त
नहीं
हुई
होती
रफ़्ता
रफ़्ता
तुझे
भुलाते
अगर
तेरी
आदत
नहीं
हुई
होती
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Zeeshan kaavish
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बिन
कहे
छोड़
के
न
जाता
तो
अपनी
आँखों
से
कुछ
जताता
तो
कुछ
तो
मजबूरियाँ
रही
होंगी
पर
वो
मजबूरियाँ
बताता
तो
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Zeeshan kaavish
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