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Zeeshan kaavish
dar se uthte hain to deewaar se lag jaate hain
dar se uthte hain to deewaar se lag jaate hain | दर से उठते हैं तो दीवार से लग जाते हैं
- Zeeshan kaavish
दर
से
उठते
हैं
तो
दीवार
से
लग
जाते
हैं
इक
झलक
उनकी
मगर
देख
नहीं
पाते
हैं
- Zeeshan kaavish
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अब
तो
उस
सूने
माथे
पर
कोरेपन
की
चादर
है
अम्मा
जी
की
सारी
सजधज,
सब
ज़ेवर
थे
बाबूजी
कभी
बड़ा
सा
हाथ
ख़र्च
थे
कभी
हथेली
की
सूजन
मेरे
मन
का
आधा
साहस,
आधा
डर
थे
बाबूजी
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Aalok Shrivastav
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जैसे
ग़लत
पते
पे
चला
आए
कोई
शख़्स
सुख
ऐसे
मेरे
दर
पे
रुका
और
गुज़र
गया
Rajesh Reddy
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शग़्ल
था
दश्त-नवर्दी
का
कभी
ऐ
'ताबाँ'
अब
गुलिस्ताँ
में
भी
जाते
हुए
डर
लगता
है
Anwar Taban
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मैं
कैसे
मान
लूँ
कि
इश्क़
बस
इक
बार
होता
है
तुझे
जितनी
दफ़ा
देखूँ
मुझे
हर
बार
होता
है
तुझे
पाने
की
हसरत
और
डर
ना-कामियाबी
का
इन्हीं
दो
तीन
बातों
से
ये
दिल
दो
चार
होता
है
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Bhaskar Shukla
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माँ
मुझे
देख
के
नाराज़
न
हो
जाए
कहीं
सर
पे
आँचल
नहीं
होता
है
तो
डर
होता
है
Anjum Rehbar
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हुस्न
ने
शौक़
के
हंगा
में
तो
देखे
थे
बहुत
इश्क़
के
दावा-ए-तक़दीस
से
डर
जाना
था
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Asrar Ul Haq Majaz
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रातें
किसी
याद
में
कटती
हैं
और
दिन
दफ़्तर
खा
जाता
है
दिल
जीने
पर
माएल
होता
है
तो
मौत
का
डर
खा
जाता
है
सच
पूछो
तो
'तहज़ीब
हाफ़ी'
मैं
ऐसे
दोस्त
से
आज़िज़
हूँ
मिलता
है
तो
बात
नहीं
करता
और
फोन
पे
सर
खा
जाता
है
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Tehzeeb Hafi
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गुज़ार
देते
हैं
रातें
पहलू
में
उसके
जुगनू
को
भी
दर
का
फ़क़ीर
बना
रखा
है
ALI ZUHRI
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दर-ब-दर
ढूँढ़
रहे
हैं
जिसे
अरसे
से
हम
शख़्स
वो
मेरी
ही
आँखों
में
छिपा
बैठा
है
Harsh saxena
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ज़िंदगी
मेरी
मुझे
क़ैद
किए
देती
है
इस
को
डर
है
मैं
किसी
और
का
हो
सकता
हूँ
Azm Shakri
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तीरगी
में
मत
बैठो
रौशनी
में
आ
जाओ
चाँद
का
ये
अरमाँ
है
चाँदनी
में
आ
जाओ
बेक़रार
है
ये
दिल
आपके
लिए
कब
से
छोड़
कर
झिझक
मेरी
ज़िंदगी
में
आ
जाओ
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Zeeshan kaavish
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तेरी
यादों
से
गुज़रने
के
लिए
ज़िंदा
रहता
हूँ
मैं
मरने
के
लिए
Zeeshan kaavish
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हम
को
इस
जाम
में
नहाने
दो
अपनी
आँखों
में
डूब
जाने
दो
आप
के
रुख़
पे
क्यूँँ
उदासी
है
अपने
होंठों
को
मुस्कुराने
दो
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Zeeshan kaavish
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मुहब्बत
का
मुहब्बत
से
कोई
जब
नाम
लेता
है
किसी
का
हो
गया
है
वो
यही
पैग़ाम
देता
है
Zeeshan kaavish
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ऐसी
हालत
नहीं
हुई
होती
गर
मुहब्बत
नहीं
हुई
होती
ज़िंदगी
किस
तरह
बसर
करते
तेरी
चाहत
नहीं
हुई
होती
हम
दीवानों
पे
वो
ही
हँसता
है
जिसको
उल्फ़त
नहीं
हुई
होती
रफ़्ता
रफ़्ता
तुझे
भुलाते
अगर
तेरी
आदत
नहीं
हुई
होती
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Zeeshan kaavish
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