daulat-e-dard sameto ki bikharna ko hai | दौलत-ए-दर्द समेटो कि बिखरने को है

  - Yasmeen Hameed
दौलत-ए-दर्दसमेटोकिबिखरनेकोहै
रातकाआख़िरीलम्हाभीगुज़रनेकोहै
ख़िश्त-दर-ख़िश्तअक़ीदतनेबनायाजिसको
अब्र-ए-आज़ारउसीघरपेठहरनेकोहै
किश्त-ए-बर्बादसेतजदीद-ए-वफ़ाकरदेखो
अबतोदरियाओंकापानीभीउतरनेकोहै
अपनीआँखोंमेंवहीअक्सलिएफिरतेहैं
जैसेआईना-ए-मक़्सूमसँवरनेकोहै
जोडुबोएगीपहुँचाएगीसाहिलपेहमें
अबवहीमौजसमुंदरसेउभरनेकोहै
कुंज-ए-तन्हाईमेंखिलताहैतख़य्युलमेरा
औरमैंख़ुशहूँकियेगुलफिरसेनिखरनेकोहै
  - Yasmeen Hameed
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