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Yashvardhan Mishra 'Hind'
ana ne haath pakda hai hamaara is qadar ki
ana ne haath pakda hai hamaara is qadar ki | अना ने हाथ पकड़ा है हमारा इस क़दर की
- Yashvardhan Mishra 'Hind'
अना
ने
हाथ
पकड़ा
है
हमारा
इस
क़दर
की
मिलाने
ही
नहीं
देता
कभी
नंबर
तुम्हारा
- Yashvardhan Mishra 'Hind'
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बे-ख़ुदी
ले
गई
कहाँ
हम
को
देर
से
इंतिज़ार
है
अपना
Meer Taqi Meer
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वो
जिस
घमंड
से
बिछड़ा
गिला
तो
इस
का
है
कि
सारी
बात
मोहब्बत
में
रख-रखाव
की
थी
Ahmad Faraz
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लोग
हम
सेे
सीखते
हैं
ग़म
छुपाने
का
हुनर
आओ
तुमको
भी
सिखा
दें
मुस्कुराने
का
हुनर
क्या
ग़ज़ब
है
तजरबे
की
भेंट
तुम
ही
चढ़
गए
तुम
से
ही
सीखा
था
हमने
दिल
दुखाने
का
हुनर
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Kashif Sayyed
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निगल
ही
चुका
था
जफ़ा
का
निवाला
अना
फिर
तमाशा
नया
कर
रही
है
Amaan Pathan
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अना
को
अपनी
समझाना
पड़ेगा
बुलाती
है,
तो
फिर
जाना
पड़ेगा
Salman Zafar
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पुरानी
कश्ती
को
पार
लेकर
फ़क़त
हमारा
हुनर
गया
है
नए
खेवइये
कहीं
न
समझें
नदी
का
पानी
उतर
गया
है
Uday Pratap Singh
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अगर
तुम्हारी
अना
ही
का
है
सवाल
तो
फिर
चलो
मैं
हाथ
बढ़ाता
हूँ
दोस्ती
के
लिए
Ahmad Faraz
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अब
तो
उस
सूने
माथे
पर
कोरेपन
की
चादर
है
अम्मा
जी
की
सारी
सजधज,
सब
ज़ेवर
थे
बाबूजी
कभी
बड़ा
सा
हाथ
ख़र्च
थे
कभी
हथेली
की
सूजन
मेरे
मन
का
आधा
साहस,
आधा
डर
थे
बाबूजी
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Aalok Shrivastav
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जो
कुछ
मता-ए-हुनर
हो
तो
सामने
लाओ
कि
ये
ज़माना-ए-इज़हार-ए-नस्ल-ओ-रंग
नहीं
Akbar Ali Khan Arshi Zadah
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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हम
तिरा
नाम
बेंच
पर
अपनी
रोज़
लिखते
हैं
और
मिटाते
हैं
Yashvardhan Mishra 'Hind'
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कोई
तो
चाहता
होगा
हमें
भी
किसी
के
फोन
में
हम
सेव
होंगे
Yashvardhan Mishra 'Hind'
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सड़क
चौक
रस्ते
सभी
हैं
वहीं
पर
हुआ
अजनबी
कोई
तो
यार
तुम
हो
यही
सामने
बोलता
हूँ
सभी
के
मिरा
प्यार
तुम
हो
मिरा
प्यार
तुम
हो
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Yashvardhan Mishra 'Hind'
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तुम्हारी
याद
क्या
आई
ज़रा
सी
चमक
चेहरे
पे
फ़ौरन
आ
गई
फिर
Yashvardhan Mishra 'Hind'
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मोहब्बत
के
ज़माने
आ
गए
हैं
उसे
रिश्ते
निभाने
आ
गए
हैं
मेरे
अहबाब
मुझ
को
कर
के
तन्हा
दुबारा
दिल
दुखाने
आ
गए
हैं
शिफ़ाई
जौन
ग़ालिब
मीर
जैसे
हमें
भी
ग़म
छुपाने
आ
गए
हैं
तुम्हें
देखा
तो
मुझ
को
याद
फिर
से
वही
नग़
में
पुराने
आ
गए
हैं
बनाये
चाँद
तारे
जब
से
मैंने
मुझे
कंगन
बनाने
आ
गए
हैं
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Yashvardhan Mishra 'Hind'
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