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Yamir Ahsan
tamaam raat ek shakhs ke li.e
tamaam raat ek shakhs ke li.e | तमाम रात एक शख़्स के लिए
- Yamir Ahsan
तमाम
रात
एक
शख़्स
के
लिए
जला
के
छोड़
रक्खे
थे
सभी
दिए
- Yamir Ahsan
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सखी
को
हमारी
नज़र
लग
न
जाए
उसे
ख़्वाब
में
रात
भर
देखते
हैं
Sahil Verma
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ख़्वाब
पलकों
की
हथेली
पे
चुने
रहते
हैं
कौन
जाने
वो
कभी
नींद
चुराने
आए
मुझ
पे
उतरे
मेरे
अल्हाम
की
बारिश
बन
कर
मुझ
को
इक
बूॅंद
समुंदर
में
छुपाने
आए
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Khalil Ur Rehman Qamar
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इन्हीं
ग़म
की
घटाओं
से
ख़ुशी
का
चाँद
निकलेगा
अँधेरी
रात
के
पर्दे
में
दिन
की
रौशनी
भी
है
Akhtar Shirani
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ईद
के
रोज़
यही
अपनी
दु'आ
है
रब
से
मुल्क
में
अमन
का,
उलफ़त
का
बसेरा
हो
जाए
हर
परेशानी
से
हर
शख़्स
को
मिल
जाए
नजात
इस
सियह
रात
का
बस
जल्द
सवेरा
हो
जाए
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Zaki Azmi
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नींद
भी
जागती
रही
पूरे
हुए
न
ख़्वाब
भी
सुब्ह
हुई
ज़मीन
पर
रात
ढली
मज़ार
में
Adil Mansuri
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चाँद
तारे
इक
दिया
और
रात
का
कोमल
बदन
सुब्ह-दम
बिखरे
पड़े
थे
चार
सू
मेरी
तरह
Aziz Nabeel
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ठंडी
चाय
की
प्याली
पी
के
रात
की
प्यास
बुझाई
है
Rais Farog
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चराग़ों
को
आँखों
में
महफ़ूज़
रखना
बड़ी
दूर
तक
रात
ही
रात
होगी
Bashir Badr
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हर
एक
रात
को
महताब
देखने
के
लिए
मैं
जागता
हूँ
तिरा
ख़्वाब
देखने
के
लिए
Azhar Inayati
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तुम्हारा
ख़्वाब
भी
आए
तो
नींद
पूरी
हो
मैं
सो
तो
जाऊँगा
नींद
आने
की
दवा
लेकर
Swapnil Tiwari
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वो
मुझको
जब
नज़रअंदाज़
करती
है
ये
ख़ामोशी
बहुत
आवाज़
करती
है
Yamir Ahsan
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वो
मेरे
लिए
जिस
क़दर
ख़ास
थी,
मैं
उसके
लिए
उतना
ही
आम
था
Yamir Ahsan
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एक
दम
पाक
हो
गया
हूँ
मैं
ख़ाक
था
ख़ाक
हो
गया
हूँ
मैं
इश्क़
में
डूबना
ही
छोड़
दिया
अच्छा
तैराक
हो
गया
हूँ
मैं
तुम
थे
तो
खौफ़
था,
तुम्हें
खो
कर
कितना
बेबाक
हो
गया
हूँ
मैं
तीर
सबने
चलाए
हैं
मुझ
पर
आम
सा
ताक
हो
गया
हूँ
मैं
मैं
किसी
पर
भी
जच
नहीं
पाता
कैसा
पोशाक
हो
गया
हूँ
मैं
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Yamir Ahsan
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पॉँव
चादर
में
सिमट
सकते
नहीं
शौक़
भी
तो
अपने
घट
सकते
नहीं
रास्तों
में
कुछ
गिराने
पड़
गए
जेब
में
सब
ख़्वाब
अट
सकते
नहीं
हम
मुसाफ़िर
हैं
तेरी
आवाज़
पे
रुक
तो
सकते
हैं
पलट
सकते
नहीं
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Yamir Ahsan
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मेरे
दिन
इतनी
तेज़ी
से
ढलने
लगे
मैं
रुका
तो
मिरे
साए
चलने
लगे
जिस
किसी
के
लिए
अपनी
मुट्ठी
कसी
हाथ
से
रेत
जैसे
फिसलने
लगे
तुम
भी
अच्छे
लगे
थे
मुझे
दूर
से
तुम
भी
नज़दीक
आकर
बदलने
लगे
वक़्त
ने
वक़्त
ऐसा
दिखाया
हमें
जो
उगलते
थे
हम
वो
निगलने
लगे
बे-वफ़ाई
पे
इक
शे'र
क्या
पढ़
दिया
लोग
कुर्सी
पे
चढ़
कर
उछलने
लगे
खेलने
का
कभी
शौक़
बदला
नहीं
सिर्फ़
अपने
खिलौने
बदलने
लगे
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Yamir Ahsan
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