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Yamir Ahsan
pankha deewaar aur khidkiyon par nazar jaati hai
pankha deewaar aur khidkiyon par nazar jaati hai | पंखा दीवार और खिड़कियों पर नज़र जाती है
- Yamir Ahsan
पंखा
दीवार
और
खिड़कियों
पर
नज़र
जाती
है
रात
यूँँ
ही
गुज़रनी
थी
यूँँ
ही
गुज़र
जाती
है
इश्क़
ने
कौन
सी
तार
जाने
कहाँ
जोड़
दी
दिल
कभी
भरने
लग
जाए
तो
आँख
भर
जाती
है
- Yamir Ahsan
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मेरे
लब
से
हटा
के
इक
सिगरेट
अपनी
आदत
लगा
गया
कोई
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क्यूँँ
सब
इतना
हसीं
है,
नए
साल
पर
कुछ
नया
तो
नहीं
है,
नए
साल
पर
फिर
तमन्ना
मुहब्बत
की
करने
लगे?
फिर
से
तुमको
यक़ीं
है
नए
साल
पर
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Yamir Ahsan
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वो
मुझको
जब
नज़रअंदाज़
करती
है
ये
ख़ामोशी
बहुत
आवाज़
करती
है
Yamir Ahsan
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मेरे
दिन
इतनी
तेज़ी
से
ढलने
लगे
मैं
रुका
तो
मिरे
साए
चलने
लगे
जिस
किसी
के
लिए
अपनी
मुट्ठी
कसी
हाथ
से
रेत
जैसे
फिसलने
लगे
तुम
भी
अच्छे
लगे
थे
मुझे
दूर
से
तुम
भी
नज़दीक
आकर
बदलने
लगे
वक़्त
ने
वक़्त
ऐसा
दिखाया
हमें
जो
उगलते
थे
हम
वो
निगलने
लगे
बे-वफ़ाई
पे
इक
शे'र
क्या
पढ़
दिया
लोग
कुर्सी
पे
चढ़
कर
उछलने
लगे
खेलने
का
कभी
शौक़
बदला
नहीं
सिर्फ़
अपने
खिलौने
बदलने
लगे
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Yamir Ahsan
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इश्क़
उसने
अब
दुबारा
कर
लिया
और
फिर
मुझ
सेे
किनारा
कर
लिया
सारी
दुनिया
जीतने
वालों
ने
भी
दिल
के
सौदे
में
ख़सारा
कर
लिया
हमने
ख़ामोशी
से
हर
मौसम
सहे
जो
मिला
उस
में
गुज़ारा
कर
लिया
हमने
जब
जब
उस
सेे
चाहा
फ़ासला
उसकी
ज़ुल्फ़ों
ने
इशारा
कर
लिया
इस
सेे
ज़्यादा
चाहिए
और
क्या
तुम्हें
बे-वफ़ा
होना
गवारा
कर
लिया
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Yamir Ahsan
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