bahaar ki ye dil-aawez shaam | बहार की ये दिल-आवेज़ शाम

  - Wali Alam Shaheen
बहारकीयेदिल-आवेज़शाम
जिसकीतरफ़
क़दमउठाएहैंमैंने
किउससेहाथमिलाऊँ
औरइकशगुफ़्ताशनासाईकीबिनारक्खूँ
फिरअपनीख़ाना-बदोशीकीमुश्तरकलयपर
उसेगुलाब-ब-कफ़ख़ेमा-ए-जुनूँतकलाऊँ
कुछउसकीख़ैरख़बरपूछूँ
औरकुछअपनीकहूँ
कहूँकिकितनेहीपतझड़केमौसमआएगए
मगरइनआँखोंकीसहर-उल-बयानियाँगईं
कहूँकिगरचेअनासिरनेतोहमतेंबाँधीं
जुनूँज़दोंकीमगरसख़्त-जानियाँगईं
कहूँकिएकहैंअंदेशेसबमिरेतेरे
कहूँअलगनहींजीनेकेढबमिरेतेरे
कहूँकिएकसेहैंरोज़-ओ-शबमिरेतेरे
कहूँकिमिलतेहैंनाम-ओ-नसबमिरेतेरे
कहूँअज़लसेजुनूँकारोबारअपनाहै
हज़ारजब्रहोकुछइख़्तियारअपनाहै
  - Wali Alam Shaheen
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