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Vishal Vishesh
ik jhalak men kaise duniya dekhte
ik jhalak men kaise duniya dekhte | इक झलक में कैसे दुनिया देखते
- Vishal Vishesh
इक
झलक
में
कैसे
दुनिया
देखते
काश
उसको
हम
दुबारा
देखते
इस
कटी
मिट्टी
में
क्या
लुत्फ़े
नज़र
बाढ़
से
पहले
किनारा
देखते
अब
तरफ़दारी
बहुत
ही
आम
है
आप
भी
अपना
पराया
देखते
लौट
कर
अब
आए
हो
अब
क्या
बचा
पहले
आ
जाते
तो
जलवा
देखते
धूप
को
चादर
किए
चलते
रहे
कब
तलक
पेड़ों
का
रस्ता
देखते
- Vishal Vishesh
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जहाँ
पर
आज
मेरा
सर
लगेगा
वहीं
कल
मील
का
पत्थर
लगेगा
खुलेंगी
कब
तुम्हारी
नर्म
बाहें
यहाँ
पर
कब
मेरा
बिस्तर
लगेगा
कहा
था
उसने
मेरा
लम्स
क्या
है
पता
ये
फूल
को
छूकर
लगेगा
ये
गुल
गमले
में
तो
अच्छा
है
लेकिन
तुम्हारे
कान
में
सुन्दर
लगेगा
मुक़द्दर
का
सफ़ीना
दर
बदर
है
ज़मीं
से
कब
मेरा
लंगर
लगेगा
करेंगे
कब
मुझे
अहबाब
तस्लीम
ख़ुदारा
कब
मुझे
घर
घर
लगेगा
ख़ुदा
के
ख़ौफ़
से
बहकाने
वाले
कभी
तुझको
भी
कोई
डर
लगेगा
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Vishal Vishesh
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मेरे
पास
खोने
को
कुछ
भी
नहीं
है
फ़लक
की
है
चादर
तो
बिस्तर
ज़मीं
है
ज़माने
से
मुझको
कोई
भी
तवक़्क़ो
नहीं
थी
नहीं
थी
नहीं
है
नहीं
है
हमेशा
रहेंगे
जो
मिलने
से
क़ासिर
हमारे
हैं
दो
लब़
तुम्हारी
जबीं
है
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Vishal Vishesh
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