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Vishal Singh Tabish
dar hai ghar men kaise bola jaayega
dar hai ghar men kaise bola jaayega | डर है घर में कैसे बोला जाएगा
- Vishal Singh Tabish
डर
है
घर
में
कैसे
बोला
जाएगा
छोड़ो
जो
भी
होगा
देखा
जाएगा
नंबर
लिखकर
हाथों
में
पकड़ा
देना
तेरे
घर
इक
छोटा
बच्चा
जाएगा
मैं
बस
उसका
चेहरा
पढ़कर
जाऊँगा
मेरा
पेपर
सब
सेे
अच्छा
जाएगा
- Vishal Singh Tabish
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मैं
कैसे
मान
लूँ
कि
इश्क़
बस
इक
बार
होता
है
तुझे
जितनी
दफ़ा
देखूँ
मुझे
हर
बार
होता
है
तुझे
पाने
की
हसरत
और
डर
ना-कामियाबी
का
इन्हीं
दो
तीन
बातों
से
ये
दिल
दो
चार
होता
है
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Bhaskar Shukla
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मेरे
नादाँ
दिल
उदासी
कोई
अच्छी
शय
नहीं
देख
सूखे
फूल
पर
आती
नहीं
हैं
तितलियाँ
Deepak Vikal
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यूँँ
देखिए
तो
आँधी
में
बस
इक
शजर
गया
लेकिन
न
जाने
कितने
परिंदों
का
घर
गया
जैसे
ग़लत
पते
पे
चला
आए
कोई
शख़्स
सुख
ऐसे
मेरे
दर
पे
रुका
और
गुज़र
गया
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Rajesh Reddy
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कल
जहाँ
दीवार
थी
है
आज
इक
दर
देखिए
क्या
समाई
थी
भला
दीवाने
के
सर
देखिए
Javed Akhtar
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और
हुआ
भी
ठीक
वो
ही
जिसका
डर
था
बोझ
इतना
रख
दिया
था
बुलबुले
पर
Siddharth Saaz
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आ
जाए
कौन
कब
कहाँ
कैसी
ख़बर
के
साथ
अपने
ही
घर
में
बैठा
हुआ
हूँ
मैं
डर
के
साथ
Pratap Somvanshi
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मैं
बार
बार
तुझे
देखता
हूॅं
इस
डर
से
कि
पिछली
बार
का
देखा
हुआ
ख़राब
न
हो
Shaheen Abbas
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जो
मेरे
साथ
मोहब्बत
में
हुई
आदमी
एक
दफा
सोचेगा
रात
इस
डर
में
गुजारी
हमने
कोई
देखेगा
तो
क्या
सोचेगा
Tehzeeb Hafi
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अजीब
सानेहा
मुझ
पर
गुज़र
गया
यारो
मैं
अपने
साए
से
कल
रात
डर
गया
यारो
Shahryar
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तमाम
शहर
को
तारीकियों
से
शिकवा
है
मगर
चराग़
की
बैअत
से
ख़ौफ़
आता
है
Aziz Nabeel
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ख़मोशी
तो
यही
बतला
रही
है
उदासी
रास
मुझको
आ
रही
है
मुझे
जिन
ग़लतियों
से
सीखना
था
वही
फिर
ज़िंदगी
दोहरा
रही
है
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Vishal Singh Tabish
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हमने
सोचा
है
इसके
बारे
में,
कुछ
मुनाफ़ा
है
इस
खसारे
में
मैं
तो
ख़्वाबों
से
तर्क
करता
था,
कुछ
न
कुछ
बात
है
तुम्हारे
में
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Vishal Singh Tabish
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भूल
जाना
नहीं
रहा
ताबिश
वो
दीवाना
नहीं
रहा
ताबिश
ज़िंदगी
का
सुलूक
मेरे
साथ
दोस्ताना
नहीं
रहा
ताबिश
हम
की
हंसते
हैं
क्योंकि
रोने
को
कोई
शाना
नहीं
रहा
ताबिश
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Vishal Singh Tabish
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ख़ुशबू
के
एहसास
पे
भागे
पागल
लोग
मेरे
जैसे
सीधे
साधे
पागल
लोग
मेरे
जैसा
ढूँढ़
रहे
हो
सब्र
करो
मिल
जाएँगे
मेरे
जैसे
पागल
लोग
दोस्त
हमारे
कोशिश
करके
हार
गए
पागल
को
कितना
समझाते
पागल
लोग
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Vishal Singh Tabish
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वो
गले
बदहवा
से
लगते
हैं
उनको
हम
ग़म-शनास
लगते
हैं
इक
ज़माने
की
दूरियाँ
हैं
मगर
दूर
होकर
भी
पास
लगते
हैं
अब
उदासी
ये
हम
पे
जँचती
है
अब
तो
हँसते
उदास
लगते
हैं
हम
में
कमियाँ
तो
लाख
हैं
ताबिश
हम
उसे
फिर
भी
ख़ास
लगते
हैं
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Vishal Singh Tabish
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