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Viru Panwar
shahar men jab janab hote the
shahar men jab janab hote the | शहर में जब जनाब होते थे
- Viru Panwar
शहर
में
जब
जनाब
होते
थे
काँटे
भी
तब
गुलाब
होते
थे
हुई
उस
दौर
में
मोहब्बत
जब
दिलों
पे
भी
नक़ाब
होते
थे
जिन
दिनों
हम
पसंद
थे
उस
की
उन
दिनों
ला-जवाब
होते
थे
यूँँ
न
कर
अब
हमें
नज़र-अंदाज़
हम
कभी
तेरा
ख़्वाब
होते
थे
बस
वही
आए
औरतों
को
पसंद
मर्द
जो
कामयाब
होते
थे
उस
की
आँखों
में
थे
वो
मंज़र
जो
देखने
से
ख़राब
होते
थे
- Viru Panwar
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ये
उदास
शाम
और
तेरी
याद
फ़ुर्क़तों
के
जाम
और
तेरी
याद
जान
ही
कहीं
मेरी
ले
न
जाए
'जौन'
का
कलाम
और
तेरी
याद
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Viru Panwar
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जिस
के
हम
मुंतज़िर
थे
अर्से
से
जा
चुका
दूसरे
वो
रस्ते
से
कौन
मेरी
ख़ुशी
का
दुश्मन
था
किस
ने
मुझ
को
बचाया
मरने
से
उस
से
तुम
बातें
करते
रहना
दोस्त
बात
बनती
है
बात
करने
से
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Viru Panwar
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वही
ख़्वाब
था
बस
मोहब्बत
मेरी
नहीं
बन
सका
जो
हक़ीक़त
मेरी
कोई
तो
निकालो
मुझे
क़ब्र
से
उसे
देखनी
है
ये
सूरत
मेरी
वो
तो
दूर
से
ही
नज़र
आता
है
ये
और
बात
कम
है
बसारत
मेरी
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Viru Panwar
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देखो
तन्हाई
मेरी
आँखों
में
उस
की
परछाई
मेरी
आँखों
में
इतना
रोया
किसी
के
ग़म
में
मैं
लग
गई
काई
मेरी
आँखों
में
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Viru Panwar
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वो
गुज़रा
था
मेरे
कुछ
इस
क़दर
नज़दीक
से
कि
उस
को
देख
भी
पाया
नहीं
मैं
ठीक
से
चराग़ों
से
सभी
के
हैं
मकाँ
रौशन
यूँँ
तो
मगर
हैं
ज़ेहन
लोगों
के
यहाँ
तारीक
से
तेरे
हर
ताने
से
हम
ने
बना
ली
है
ग़ज़ल
तुझे
दी
मात
यानी
तेरी
ही
तकनीक
से
अगर
करना
है
तुम
को
ज़िंदगी
में
कुछ
अलग
तो
चलना
ही
पड़ेगा
फिर
तो
हट
के
लीक
से
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Viru Panwar
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