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Viru Panwar
jis ke ham muntazir the arse se
jis ke ham muntazir the arse se | जिस के हम मुंतज़िर थे अर्से से
- Viru Panwar
जिस
के
हम
मुंतज़िर
थे
अर्से
से
जा
चुका
दूसरे
वो
रस्ते
से
कौन
मेरी
ख़ुशी
का
दुश्मन
था
किस
ने
मुझ
को
बचाया
मरने
से
उस
से
तुम
बातें
करते
रहना
दोस्त
बात
बनती
है
बात
करने
से
- Viru Panwar
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जब
तलक
उस
की
दास्तान
में
था
मैं
यहाँ
हर
किसी
के
ध्यान
में
था
इक
तरफ़
थी
वो
इक
तरफ़
थी
मौत
और
मैं
दोनों
के
दरमियान
में
था
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Viru Panwar
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इसलिए
उम्र
भर
रहा
नाकाम
वो
मुझे
कहती
थी
मेरा
नाकाम
आशिक़ों
को
दिए
गए
दो
नाम
पहला
आवारा
दूसरा
नाकाम
पहला
तो
ख़ैर
हो
ही
जाता
है
दूसरा
इश्क़
भी
हुआ
नाकाम
किस
तरह
आप
मुझ
को
भूल
गए
मैं
वही
तो
हूँ
आपका
नाकाम
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पूछते
हैं
वो
कब
ख़राब
हुए
जब
मिले
उन
से
तब
ख़राब
हुए
उस
को
इक
बार
भी
न
चूम
सका
इसलिए
मेरे
लब
ख़राब
हुए
ये
जहान-ए-ख़राब
बनने
में
साल
कितने
अरब
ख़राब
हुए
दोस्ती
भूले
दुश्मनी
भूले
यार
मेरे
अजब
ख़राब
हुए
'मीर'
हो
'जौन'
हो
या
हो
'ग़ालिब'
इस
मोहब्बत
में
सब
ख़राब
हुए
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ख़ुशियों
का
रास्ता
नहीं
मिलता
उस
के
घर
का
पता
नहीं
मिलता
पहले
मिलती
थी
खिड़कियाँ
भी
खुलीं
अब
तो
दर
भी
खुला
नहीं
मिलता
मिलते
हैं
लोग
उधर
के
पर
कोई
उस
की
पहचान
का
नहीं
मिलता
मुझ
को
मिलता
नहीं
है
वो
इक
शख़्स
और
उस
को
ख़ुदा
नहीं
मिलता
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दिल-लगी
अपने
बस
की
बात
नहीं
शा'इरी
अपने
बस
की
बात
नहीं
अच्छा
होगा
कि
मौत
आ
जाए
ज़िंदगी
अपने
बस
की
बात
नहीं
मुझ
से
तू
रिश्ता
रखना
दोस्ती
का
आशिक़ी
अपने
बस
की
बात
नहीं
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