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Viru Panwar
agar azal waale din banii ho
agar azal waale din banii ho | अगर अज़ल वाले दिन बनी हो
- Viru Panwar
अगर
अज़ल
वाले
दिन
बनी
हो
बताओ
आदम
को
जानती
हो
तुम्हारी
बातों
से
लग
रहा
है
किसी
की
बातों
में
आ
गई
हो
बनाया
है
किस
के
दिल
को
घर
अब
मेरे
तो
दिल
से
निकल
चुकी
हो
उदास
हैं
तितलियाँ
हमारी
ये
कौन
से
बाग़
में
खिली
हो
- Viru Panwar
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शहर
में
जब
जनाब
होते
थे
काँटे
भी
तब
गुलाब
होते
थे
हुई
उस
दौर
में
मोहब्बत
जब
दिलों
पे
भी
नक़ाब
होते
थे
जिन
दिनों
हम
पसंद
थे
उस
की
उन
दिनों
ला-जवाब
होते
थे
यूँँ
न
कर
अब
हमें
नज़र-अंदाज़
हम
कभी
तेरा
ख़्वाब
होते
थे
बस
वही
आए
औरतों
को
पसंद
मर्द
जो
कामयाब
होते
थे
उस
की
आँखों
में
थे
वो
मंज़र
जो
देखने
से
ख़राब
होते
थे
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तुम्हारी
कमी
कौन
पूरी
करेगा
मेरी
ज़िंदगी
कौन
पूरी
करेगा
था
रौशन
तेरे
होने
से
जो
इलाक़ा
वहाँ
रौशनी
कौन
पूरी
करेगा
मैं
गर
वक़्त
से
पहले
ही
मर
गया
तो
मेरी
शा'इरी
कौन
पूरी
करेगा
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आने
ही
वाला
है
लम्हा
ख़ुशी
का
वक़्त
पूरा
हो
गया
ज़िंदगी
का
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मोहब्बत
का
दिखावा
कर
रहा
हूँ
तुम्हारे
साथ
धोखा
कर
रहा
हूँ
ये
चौथा
दिल
है
जिस
में
घर
किया
है
मगर
मैं
इश्क़
पहला
कर
रहा
हूँ
यूँँ
आए
दिन
नए
लोगों
से
मिल
कर
मैं
ख़ुद
को
और
तन्हा
कर
रहा
हूँ
नहीं
कर
पाया
दुनिया
दिल
के
जैसी
सो
दिल
को
दुनिया
जैसा
कर
रहा
हूँ
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समय
अच्छा
नहीं
आता
घड़ी
अच्छी
नहीं
लगती
दिल-ए-नाकाम
को
अब
ज़िंदगी
अच्छी
नहीं
लगती
पता
होता
अगर
तो
लिखते
हम
उसके
लिए
भी
कुछ
हमें
लगता
था
उस
को
शा'इरी
अच्छी
नहीं
लगती
या
रब
उकता
गया
हूँ
ज़िंदगी
से
इस
क़दर
अब
तो
मुझे
माँ
की
बनाई
रोटी
भी
अच्छी
नहीं
लगती
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Viru Panwar
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