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Ved prakash Pandey
ye charagon ki hi jasaarat thii
ye charagon ki hi jasaarat thii | ये चराग़ों की ही जसारत थी
- Ved prakash Pandey
ये
चराग़ों
की
ही
जसारत
थी
वरना
बुझ
जाते
ऐसी
हालत
थी
मेरे
अंदर
जो
मर
गया
है
ना
उसको
तुम
सेे
बहुत
मुहब्बत
थी
आप
क्यूँ
हम
पे
मर
गए
जब
के
आपको
जीने
की
सहूलत
थी
कर
लिया
ऐतबार
जो
भी
मिला
दिल
लगाने
की
इतनी
उजलत
थी
आपसे
जिस्म
किसने
माँगा
था
हमको
बस
प्यार
की
जरुरत
थी
उसके
धोके
से
पहले
दिल
में
मेरे
प्यार
देने
की
इक
रिवायत
थी
उस
गली
से
गुज़रना
ही
यारों
दिल
की
सब
सेे
बड़ी
हिमाकत
थी
तुम
क्यूँ
रोते
हो
इश्क़
के
लिए
अब
तुमको
तो
जिस्म
की
जरुरत
थी
हो
गए
मूव
ऑन
सो
उन
सेे
दोस्ती
थी
न
अब
अदावत
थी
मुंतज़िर
सिर्फ़
तुम
नहीं
थे
कल
शहर
भर
में
हमारी
दावत
थी
इसलिए
रिश्ते
नाते
छूट
गए
हमको
सच
बोलने
की
आदत
थी
हमको
कमअक्ल
ही
रखा
तुमने
उम्र
तुम
सेे
यही
शिकायत
थी
बेवफाई
ने
जाँ
ले
ली
वरना
प्यार
करना
तो
उसकी
आदत
थी
मेरी
सुनता
न
था
कोई
"कातिब"
शहर
में
आज
ऐसी
वहशत
थी
- Ved prakash Pandey
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ऐ
शहर-ए-जान-ए-जाँ
ऐ
शहर-ए-हमदम
अगर
ज़िन्दा
रहे
फिर
आएँगे
हम
Shajar Abbas
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तुम्हें
मैं
क्या
बताऊँ
इस
शहर
का
हाल
कैसा
है
यहाँ
बारिश
तो
होती
है
मगर
सावन
नहीं
आता
Bhaskar Shukla
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बाद
उसके
दिल-नगर
फिर
बस
गया
एहतरामन
इक
गली
वीरान
है
Vishal Bagh
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उसको
शहर
की
सड़कें
अच्छी
लगती
हैं
मेरा
क्या
है
मुझको
चलना
पड़ता
है
Kafeel Rana
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आँख
वो
इक
शहर
जिस
में
दम
घुटेगा
दिल
में
रहना
घर
में
रहने
की
तरह
है
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Neeraj Neer
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और
क्या
चाहती
है
गर्दिश-ए-अय्याम
कि
हम
अपना
घर
भूल
गए
उन
की
गली
भूल
गए
Jaun Elia
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मेरे
ही
संग-ओ-ख़िश्त
से
तामीर-ए-बाम-ओ-दर
मेरे
ही
घर
को
शहर
में
शामिल
कहा
न
जाए
Majrooh Sultanpuri
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इसी
फ़कीर
की
गफ़लत
से
आगही
ली
है
मेरे
चराग़
से
सूरज
ने
रौशनी
ली
है
गली-गली
में
भटकता
है
शोर
करता
हुआ
हमारे
इश्क़
ने
सस्ती
शराब
पी
ली
है
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Ammar Iqbal
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तेरी
आवाज़
को
इस
शहर
की
लहरें
तरसती
हैं
ग़लत
नंबर
मिलाता
हूँ
तो
पहरों
बात
होती
है
Ghulam Mohammad Qasir
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अब
तो
गाँवो
में
भी
ईंटों
के
महल
बसने
लगे
गाँव
की
मिट्टी
से
वो
ख़ुशबू
रूहानी
ख़ो
गई
Divy Kamaldhwaj
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इश्क़
का
फ़ैसला
ग़लत
हुआ
तो?
रात
भर
जागना
ग़लत
हुआ
तो?
दिल
कहाँ
इतना
सोच
पाता
है
आँख
में
डूबना
ग़लत
हुआ
तो?
कई
मासूम
जाँ
से
जायेगें
तेरा
कुछ
भी
कहा
ग़लत
हुआ
तो
वो
बिछड़कर
के
मुझ
सेे
ख़ुश
होगा
मेरा
ये
सोचना
ग़लत
हुआ
तो?
इश्क़
लायक
नहीं
भरोसे
के
बाद
में
रास्ता
ग़लत
हुआ
तो?
भरी
आँखों
से
पूछा
था
किसी
ने
लखनऊ
छोड़ना
ग़लत
हुआ
तो।।
उसको
कर
तो
दूँ
बेनक़ाब
मगर
यार
ग़ुस्सा
मिरा
ग़लत
हुआ
तो?
हिज़्र
के
नागवार
मौसम
में
खिड़कियाँ
खोलना
ग़लत
हुआ
तो?
ढूँढने
चल
दिए
तो
हो
ख़ुद
को
तेरा
ये
भी
पता
ग़लत
हुआ
तो?
मेरे
अगलात
सामने
रक्खो
बाद
में
टोकना
ग़लत
हुआ
तो?
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Ved prakash Pandey
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दस्त
हक़
में
मिरे
उठा
दो
बस
मुझको
पैसे
नहीं
दु'आ
दो
बस
उसकी
तस्वीर
को
बनाते
वक़्त
मुझको
तस्वीर
से
हटा
दो
बस
मूड
मेरा
बहुत
ख़राब
है
दोस्त
कोई
अच्छी
ग़ज़ल
सुना
दो
बस
मैं
किसी
और
का
न
हो
पाया
कोई
जाकर
उसे
बता
दो
बस
कल
जो
लड़की
मिली
थी
साड़ी
में
मुझको
उसका
कोई
पता
दो
बस
इश्क़
उकता
गया
है
दर्शन
से
तुम
बदन
का
मुझे
पता
दो
बस
आख़िरी
चीज़
भी
करो
'कातिब'
उठ
के
सूरज
को
अब
बुझा
दो
बस
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Ved prakash Pandey
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ये
भँवर
है
आपकी
दुनिया
नहीं
इस
पते
पर
अब
कोई
रहता
नहीं
एक
ही
ग़म
एक
ही
तकलीफ
है
जो
कभी
मेरा
था,अब
मेरा
नहीं
जब
जरुरत
थी
तुम्हारी,
तुम
न
थे
साथ
रहते
तुम
तो
कुछ
खोता
नहीं
मैं
मुहब्बत
फिर
से
कर
तो
लूँ
मगर
ये
तमाशा
हम
सेे
अब
होगा
नहीं
एक
ग़म
दिल
में
दबाये
जी
रहा
एक
चेहरा
है
जिसे
भूला
नहीं
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Ved prakash Pandey
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मेरी
सारी
ग़ज़लें
तुम
बिन
खारिज़
हैं
क्या
तुमको
इसका
थोड़ा
भी
इल्म
न
था
Ved prakash Pandey
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गाने
नुसरत
के
हाए!
बारिश
में
उसपे
इक
प्याली
चाय
बारिश
में
भींगता
जिस्म
थरथराता
हुस्न
और
ख़ाली
सराय
बारिश
में
कितना
अच्छा
हो
साथ
हो
हम
तुम
और
हो
इक
प्याली
चाय
बारिश
में
झूम
उठ्ठे
फ़ज़ा
वो
लड़की
जब
प्रेम
धुन
गुनगुनाये
बारिश
में
काश
ऐसा
हो,
पास
आने
के
वो
भी
सोचे
उपाय
बारिश
में
गर
इजाजत
हो
तो
तिरे
लब
से
पी
लें
दो
घूंट
चाय
बारिश
में
यूँँ
तो
हर
शै
हसीं
है
पर
उसका
वो
बदन
आए
हाए
बारिश
में
उसकी
गिनती
मुनाफ़िक़ों
में
हो
जो
भी
ख़ुद
को
बचाये
बारिश
में
उसके
पायल
के
छंछनाहट
की
याद
"कातिब"
सताए
बारिश
में
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