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Purushottam Tripathi
jis samay main maun hokar baith jaaun
jis samay main maun hokar baith jaaun | जिस समय मैं मौन होकर बैठ जाऊँ
- Purushottam Tripathi
जिस
समय
मैं
मौन
होकर
बैठ
जाऊँ
तुम
मुझे
उस
वक़्त
ख़ामोशी
से
सुनना
- Purushottam Tripathi
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कभी
तो
चाहिए
इस
जिस्म-ए-ज़िंदाँ
से
रिहाई
भी
कभी
तो
चाहिए
अपनों
से
दिल
को
आशनाई
भी
मेरी
मंज़िल
तेरी
ज़ुल्फ़ों
के
पेच-ओ-ख़म
से
आगे
है
मेरे
ज़िम्में
है
घर
वालों
की
रोटी
भी
दवाई
भी
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फिर
वही
ज़िंदगी
शुरू
कर
दी
हमने
भी
शा'इरी
शुरू
कर
दी
इश्क़
के
साथ
घर
चलाना
था
इसलिए
नौकरी
शुरू
कर
दी
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तेरी
आँखों
का
वो
नीला
समुंदर
याद
आता
है
बिछड़ते
वक़्त
का
वो
एक
मंज़र
याद
आता
है
तू
मुझको
हर
समय
कुछ
इस
तरह
से
याद
आती
है
कि
जैसे
जेठ
में
सबको
दिसम्बर
याद
आता
है
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हर
इक
सूखे
सुबू
को
भर
रहा
है
वो
सबके
ख़्वाब
पूरे
कर
रहा
है
मैं
हर
इक
दिन
बड़ा
तो
हो
रहा
हूँ
मेरे
अंदर
का
बच्चा
मर
रहा
है
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कहीं
पर
कोई
है
जो
ख़ुद
की
परछाई
से
डरता
है
कोई
महफ़िल
तो
कोई
है
जो
तन्हाई
से
डरता
है
यहाँ
हर
शख़्स
कहता
है
ये
दुनिया
ख़ूब-सूरत
है
मेरे
अंदर
जो
लड़का
है
वो
रा'नाई
से
डरता
है
वही
इक
रोज़
इक
लड़की
की
बिछड़न
देख
ली
जबसे
उसी
दिन
से
ये
मेरा
दिल
भी
शहनाई
से
डरता
है
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