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Salma Malik
sukhun men dukhan shayari hai
sukhun men dukhan shayari hai | सुख़न में दुखन शा'इरी है
- Salma Malik
सुख़न
में
दुखन
शा'इरी
है
यही
एक
फ़न
शा'इरी
है
चुभे
टीस
बनकर
सदा
ही
तिरी
ये
चुभन
शा'इरी
है
बना
सादगी
के
लिए
जो
वही
पैरहन
शा'इरी
है
छुआ
लफ़्ज़
बनकर
किसी
ने
उसी
की
छुअन
शा'इरी
है
न
कहकर
सभी
को
दिखे
जो
यही
तो
शिकन
शा'इरी
है
रगों
में
बहे
ख़ून
बनकर
मिरा
ये
बदन
शा'इरी
है
न
ये
राज़
'सलमा'
कहेगी
मगर
ये
घुटन
शा'इरी
है
- Salma Malik
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बिठा
दिया
है
सिपाही
के
दिल
में
डर
उसने
तलाशी
दी
है
दुपट्टा
उतार
कर
उसने
मैं
इसलिए
भी
उसे
ख़ुद-कुशी
से
रोकता
हूँ
लिखा
हुआ
है
मेरा
नाम
जिस्म
पर
उसने
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Zia Mazkoor
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कभी
मिलता
नहीं
क्यूँ
मुझ
को
मुझ
में
कहाँ
है
गर
मेरे
अंदर
ख़ुदा
है
भटकती
है
कहीं
और
ही
मेरी
रूह
बदन
मेरा
कहीं
और
ही
पड़ा
है
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Chandan Sharma
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ये
जानते
हैं
ठीक
नहीं
माँग
रहे
हैं
हम
एक
खंडहर
को
मकीं
माँग
रहे
हैं
सब
माँग
रहे
हैं
ख़ुदास
तेरा
जिस्म
और
हम
हैं,
कि
फ़क़त
तेरी
जबीं
माँग
रहे
हैं
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Siddharth Saaz
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मिरे
सूरज
आ!
मिरे
जिस्म
पे
अपना
साया
कर
बड़ी
तेज़
हवा
है
सर्दी
आज
ग़ज़ब
की
है
Shahryar
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हम
उस
में
बैठ
के
करते
हैं
साधना
तेरी
हमारा
जिस्म
भी
भीतर
से
एक
शिवाला
है
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Irshad Khan Sikandar
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उस
साँवले
से
जिस्म
को
देखा
ही
था
कि
बस
घुलने
लगे
ज़बाँ
पे
मज़े
चाकलेट
के
Shahid Kabir
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हमारे
बाद
तेरे
इश्क़
में
नए
लड़के
बदन
तो
चू
मेंगे
ज़ुल्फ़ें
नहीं
सँवारेंगे
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Vikram Gaur Vairagi
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पिघल
रहा
है
दुपहरी
में
यूँँ
वो
मोम
बदन
कहाँ
कहाँ
से
न
गुजरेगा
पसीना
हाए
Vishnu virat
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मैं
आ
रहा
हूँ
अभी
चूम
कर
बदन
उस
का
सुना
था
आग
पे
बोसा
रक़म
नहीं
होता
Shanawar Ishaq
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फूलों
की
सेज
पर
ज़रा
आराम
क्या
किया
उस
गुल-बदन
पे
नक़्श
उठ
आए
गुलाब
के
Adil Mansuri
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शा'इरी
रूह
की
है
इबादत
इस
इबादत
से
मुझको
मुहब्बत
भूल
जाता
है
बच्चा
भला
क्यूँ
वो
है
माँ
बाप
की
एक
दौलत
आम
से
हर
ग़ज़ल
ख़ास
हो
ये
बस
यही
दिल
में
है
एक
हसरत
ढूँढता
जो
फिरे
हम-क़वाफ़ी
शा'इरी
पर
है
वो
शख़्स
तोहमत
है
अलिफ़
वस्ल
सी
छूट
इस
में
शा'इरी
में
बड़ी
है
इज़ाफ़त
अब
यही
बस
मुझे
तुम
सेे
कहना
है
मुझे
शा'इरी
से
मुहब्बत
छूट
जाए
न
'सलमा'
क़लम
ये
बस
यही
एक
डर
है
क़यामत
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Salma Malik
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तुम
किस
कदर
अपनी
अना
में
फिरते
हो
हम
किस
कदर
तुम
पर
गुमाँ
करते
रहे
Salma Malik
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यूँँ
किसी
को
किसी
से
अदावत
हुई
बढ़
गया
जो
सितम
तो
ख़िलाफ़त
हुई
जाँ
लुटा
कर
गए
दोस्ती
में
सभी
इक
दफ़ा
जो
किसी
से
रिफ़ाक़त
हुई
हादसों
में
फ़ना
कर
न
दें
ये
तुम्हें,
छोड़
दो
अब
बहुत
ये
शराफ़त
हुई
फिर
कहाँ
फ़िक्र
अपनी
की
उस
शख़्स
ने
गर
किसी
को
किसी
से
मुहब्बत
हुई
रुक
न
जाए
अभी
ये
क़लम
कातिबों
गर
मुकम्मल
नहीं
ये
किताबत
हुई
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Salma Malik
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हर
चोट
खाया
शा'इरी
तो
करता
है
हर
चोट
खाया
तो
मगर
शायर
नहीं
Salma Malik
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इक
क़लम
सी
है
किरदार
'सलमा'
बस
किताबत
महज़
काम
उसका
Salma Malik
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