mire li.e kabhi khidki nahin khulii samjho | मिरे लिए कभी खिड़की नहीं खुली समझो

  - Aakash Giri
मिरेलिएकभीखिड़कीनहींखुलीसमझो
नहींथाइश्क़उसेमुझसेेबसयहीसमझो
हसीनलोगकहेंगेतोसचकहेंगेफिर
जोदिनकोरातकहेंगरतोरातहीसमझो
मैंइतनाभीतोसमझदारहोनहींपाया
केकाटदूँगाबिनातेरेज़िन्दगीसमझो
ज़रासादूरहटोसामनेसेहटजाओ
किसीधेपड़तीहैआँखोंमेंरौशनीसमझो
तमामउम्रतुम्हारेबिनानिकालेंगे
निकाललेंगेघड़ेसेकोईनदीसमझो
कोईचराग़बुझादेताहैमिरेघरका
भलाकहाँसेहोपाएगीरौशनीसमझो
मैंऐसाहीहूँबदलभीनहींसकाख़ुदको
इसेदिखावायातुममेरीसादगीसमझो
  - Aakash Giri
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy