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ABhishek Parashar
raat bhar jaagkar yahii socha
raat bhar jaagkar yahii socha | रात भर जागकर यही सोचा
- ABhishek Parashar
रात
भर
जागकर
यही
सोचा
ख़ुद-कुशी
कोई
कैसे
करता
है
- ABhishek Parashar
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बिगड़
गई
थी
जो
दुनिया
सॅंवार
दी
हमने
चढ़ा
के
सर
पे
मुहब्बत
उतार
दी
हमने
अँधेरी
रात
किसी
बे-वफ़ा
की
यादों
में
बहुत
तवील
थी
लेकिन
गुज़ार
दी
हमने
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Hameed Sarwar Bahraichi
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रात
बाक़ी
थी
जब
वो
बिछड़े
थे
कट
गई
उम्र
रात
बाक़ी
है
Khumar Barabankvi
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रात
सोने
के
लिए
दिन
काम
करने
के
लिए
वक़्त
मिलता
ही
नहीं
आराम
करने
के
लिए
Jamal Ehsani
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क्या
बैठ
जाएँ
आन
के
नज़दीक
आप
के
बस
रात
काटनी
है
हमें
आग
ताप
के
कहिए
तो
आप
को
भी
पहन
कर
मैं
देख
लूँ
मा'शूक़
यूँँ
तो
हैं
ही
नहीं
मेरी
नाप
के
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Farhat Ehsaas
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सिगरटें
चाय
धुआँ
रात
गए
तक
बहसें
और
कोई
फूल
सा
आँचल
कहीं
नम
होता
है
Wali Aasi
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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नज़रें
हो
गड़ीं
जिनकी
वसीयत
पे
दिनो-रात
माँ-बाप
कि
'उम्रों
कि
दु'आ
ख़ाक
करेंगे
Asad Akbarabadi
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मैं
रोज़
रात
यही
सोच
कर
तो
सोता
हूँ
कि
कल
से
वक़्त
निकालूँगा
ज़िन्दगी
के
लिए
Swapnil Tiwari
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खुलती
है
मेरी
नींद
हर
इक
रात
दो
बजे
इक
रात
दो
बजे
मुझे
छोड़ा
था
आपने
Tanoj Dadhich
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सर्द
रात
है
हवा
भी
सोच
मत
पहन
मुझे
सुब्ह
देख
लेंगे
किस
कलर
की
शाल
लेनी
है
Neeraj Neer
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रोने
के
बाद
मुस्कुराया
हूँ
मैं
उदासी
को
बेच
आया
हूँ
अब
तो
ये
जंग
ख़त्म
कर
दो
तुम
दोस्त
अब
तो
मैं
फूल
लाया
हूँ
आज
मरने
का
दिल
हुआ
मेरा
आज
को
कल
पे
टाल
आया
हूँ
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ABhishek Parashar
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कुछ
परिंदे
उड़ान
भरते
हैं
सारे
उड़ने
की
बात
करते
हैं
आपको
सब
से
प्यार
है
लेकिन
आपसे
कितने
प्यार
करते
हैं
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ABhishek Parashar
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ग़म
से
कह
दो
कि
रहे
मुझ
सेे
दूर
केक
इस
बार
ख़ुशी
काटेगी
ABhishek Parashar
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तुम्हारे
बाद
देखो
क्या
हुआ
है
उदासी
और
ग़म
फैला
हुआ
है
तुम्हारा
जिस्म
हम
को
चाहिए
था
मोहब्बत
से
किसी
का
क्या
हुआ
है
हक़ीक़त
में
तो
पाबंदी
लगी
है
सो
उसका
ख़्वाब
में
आना
हुआ
है
उसे
हम
आज
देखेंगे
जी
भर
के
महीनों
बाद
अब
मिलना
हुआ
है
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ABhishek Parashar
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मुझे
भी
लग
गई
बीमारी
आख़िर
इश्क़
की
दोस्त
मिरे
दिल
पर
भी
कब्ज़ा
कर
लिया
आख़िर
किसी
ने
ABhishek Parashar
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