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Tehzeeb Hafi
vo jis ki chaanv men pacchees saal guzre hain
vo jis ki chaanv men pacchees saal guzre hain | वो जिस की छाँव में पच्चीस साल गुज़रे हैं
- Tehzeeb Hafi
वो
जिस
की
छाँव
में
पच्चीस
साल
गुज़रे
हैं
वो
पेड़
मुझ
से
कोई
बात
क्यूँँ
नहीं
करता
- Tehzeeb Hafi
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पेड़
के
काटने
वालों
को
ये
मालूम
तो
था
जिस्म
जल
जाएँगे
जब
सर
पे
न
साया
होगा
Kaifi Azmi
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इसी
से
जान
गया
मैं
कि
बख़्त
ढलने
लगे
मैं
थक
के
छाँव
में
बैठा
तो
पेड़
चलने
लगे
मैं
दे
रहा
था
सहारे
तो
इक
हुजूम
में
था
जो
गिर
पड़ा
तो
सभी
रास्ता
बदलने
लगे
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Farhat Abbas Shah
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दोस्त
अपना
हक़
अदा
करने
लगे
बेवफ़ाई
हमनवा
करने
लगे
मेरे
घर
से
एक
चिंगारी
उठी
पेड़
पत्ते
सब
हवा
करने
लगे
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Santosh S Singh
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एक
पत्ता
शजर-ए-उम्र
से
लो
और
गिरा
लोग
कहते
हैं
मुबारक
हो
नया
साल
तुम्हें
Unknown
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एक
साया
है
घने
पेड़
का
मेरे
सर
पर
एक
आँचल
से
मुझे
ठंडी
हवा
आती
है
Binte Reshma
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वो
पेड़
जिस
की
छाँव
में
कटी
थी
उम्र
गाँव
में
मैं
चूम
चूम
थक
गया
मगर
ये
दिल
भरा
नहीं
Hammad Niyazi
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कुछ
भी
नहीं
तो
पेड़
की
तस्वीर
ही
सही
घर
में
थोड़ी
बहुत
तो
हरियाली
चाहिये
Himanshu Kiran Sharma
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लो
चाँद
हो
गया
नमू
माह-ए-ख़राम
का
ऐ
मोमिनों
लिबास-ए-सियाह
ज़ेब-ए-तन
करो
फ़र्श-ए-अज़ा
बिछा
के
अज़ाख़ाने
में
शजर
अब
सुब्ह-ओ-शाम
ज़िक्र-ए-ग़रीब-उल-वतन
करो
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Shajar Abbas
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उड़
गए
सारे
परिंदे
मौसमों
की
चाह
में
इंतिज़ार
उन
का
मगर
बूढे
शजर
करते
रहे
Ambreen Haseeb Ambar
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मेरे
आँगन
में
एक
बूढ़ा
पेड़
छाँव
भी
देता
है,
दुआएँ
भी
Ankit Maurya
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महीनों
बाद
दफ्तर
आ
रहे
हैं
हम
एक
सद
में
से
बाहर
आ
रहे
हैं
तेरी
बाहों
से
दिल
उकता
गया
हैं
अब
इस
झूले
में
चक्कर
आ
रहे
हैं
कहाँ
सोया
है
चौकीदार
मेरा
ये
कैसे
लोग
अंदर
आ
रहे
हैं
समुंदर
कर
चुका
तस्लीम
हमको
खजाने
ख़ुद
ही
ऊपर
आ
रहे
हैं
यही
एक
दिन
बचा
था
देखने
को
उसे
बस
में
बिठा
कर
आ
रहे
हैं
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Tehzeeb Hafi
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मैं
सुख़न
में
हूँ
उस
जगह
कि
जहाँ
साँस
लेना
भी
शा'इरी
है
मुझे
Tehzeeb Hafi
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ग़लत
निकले
सब
अंदाज़े
हमारे
कि
दिन
आए
नहीं
अच्छे
हमारे
सफ़र
से
बाज़
रहने
को
कहा
हैं
किसी
ने
खोल
के
तस्में
हमारे
हर
इक
मौसम
बहुत
अंदर
तक
आया
खुले
रहते
थे
दरवाज़े
हमारे
उस
अब्र-ए-मेहरबाँ
से
क्या
शिकायत
अगर
बर्तन
नहीं
भरते
हमारे
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Tehzeeb Hafi
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तिलिस्म-ए-यार
ये
पहलू
निकाल
लेता
है
कि
पत्थरों
से
भी
ख़ुशबू
निकाल
लेता
है
है
बे-लिहाज़
कुछ
ऐसा
की
आँख
लगते
ही
वो
सर
के
नीचे
से
बाजू
निकाल
लेता
है
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Tehzeeb Hafi
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और
फिर
एक
दिन
बैठे
बैठे
मुझे
अपनी
दुनिया
बुरी
लग
गई
जिसको
आबाद
करते
हुए
मेरे
मां-बाप
की
ज़िंदगी
लग
गई
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Tehzeeb Hafi
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