gham men rota hooñ tire subh kahii shaam kahii | ग़म में रोता हूँ तिरे सुब्ह कहीं शाम कहीं

  - Taban Abdul Hai
ग़ममेंरोताहूँतिरेसुब्हकहींशामकहीं
चाहनेवालेकोहोताभीहैआरामकहीं
वस्लहोवस्लइलाहीकिमुझेताबनहीं
दूरहूँदूरमिरेहिज्रकेअय्यामकहीं
लगरहीहैंतिरे'आशिक़कीजोआँखेंछतसे
तुजकोदेखाथामगरउननेलब-ए-बामकहीं
आशिक़ोंकेभीलड़ानेकीतुझेक्याढबहै
चश्म-बाज़ीहैकहींबोसापैग़ामकहीं
यमनीकीसीतरहलख़्त-ए-जिगरपरखोदूँ
मुजकोमालूमअगरहोवेतिरानामकहीं
हिज्रमेंउसबुत-ए-काफ़िरकेतड़पतेहैंपड़े
अहल-ए-ज़ुन्नारकहींसाहब-ए-इस्लामकहीं
आरज़ूहैमिरे'ताबाँ'कोभीअबक़ातिल
किबरआएतिरेहाथोंसेमिराकामकहीं
  - Taban Abdul Hai
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