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Swapnil Tiwari
utara utara to yuñ chehra na ghadi ka hota
utara utara to yuñ chehra na ghadi ka hota | उतरा उतरा तो यूँँ चेहरा न घड़ी का होता
- Swapnil Tiwari
उतरा
उतरा
तो
यूँँ
चेहरा
न
घड़ी
का
होता
ज़ायक़ा
वक़्त
का
थोड़ा
भी
जो
मीठा
होता
रात
इक
रोज़
तो
मेले
में
निकलती
अपने
चाँद
इक
शाम
तो
पानी
का
बताशा
होता
तब
मुझे
सब
ही
समझते
तिरा
जोगी
जानाँ
मेरे
माथे
पे
अगर
हिज्र
का
टीका
होता
- Swapnil Tiwari
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बदन
के
दोनों
किनारों
से
जल
रहा
हूँ
मैं
कि
छू
रहा
हूँ
तुझे
और
पिघल
रहा
हूँ
मैं
Irfan Siddiqi
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हो
गए
राम
जो
तुम
ग़ैर
से
ए
जान-ए-जहाँ
जल
रही
है
दिल-ए-पुर-नूर
की
लंका
देखो
Kalb-E-Hussain Nadir
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रोते
बच्चे
पूछ
रहे
हैं
मम्मी
से
कितना
पानी
और
मिलाया
जाएगा
Divy Kamaldhwaj
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तेरी
गली
को
छोड़
के
पागल
नहीं
गया
रस्सी
तो
जल
गई
है
मगर
बल
नहीं
गया
मजनूँ
की
तरह
छोड़ा
नहीं
मैं
ने
शहर
को
या'नी
मैं
हिज्र
काटने
जंगल
नहीं
गया
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Ismail Raaz
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हमारी
मुस्कुराहट
पर
न
जाना
दिया
तो
क़ब्र
पर
भी
जल
रहा
है
Aanis Moin
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मेरी
तक़दीर
में
जलना
है
तो
जल
जाऊँगा
तेरा
वा'दा
तो
नहीं
हूँ
जो
बदल
जाऊँगा
Sahir Ludhianvi
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लगा
आग
पानी
को
दौड़े
है
तू
ये
गर्मी
तेरी
इस
शरारत
के
बाद
Meer Taqi Meer
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मुझे
भी
बख़्श
दे
लहजे
की
ख़ुशबयानी
सब
तेरे
असर
में
हैं
अल्फ़ाज़
सब,
म'आनी
सब
मेरे
बदन
को
खिलाती
है
फूल
की
मानिंद
कि
उस
निगाह
में
है
धूप,
छाँव,
पानी
सब
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Subhan Asad
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जल
चुका
है
जिस्म
मेरा
राख
हूँ
मैं
पर
मुझे
अब
भी
मिली
राहत
नहीं
है
Shashank Shekhar Pathak
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गिले
शिकवे
ज़रूरी
हैं
अगर
सच्ची
मुहब्बत
है
जहाँ
पानी
बहुत
गहरा
हो
थोड़ी
काई
रहती
है
Munawwar Rana
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किसी
दिन
धूप
मेरे
साथ
होगी
तिरे
साए
पे
उस
से
बात
होगी
ख़मोशी
नाम
से
जानेगी
दुनिया
ये
लड़की
इस
क़दर
चुप-ज़ात
होगी
ख़बर
कर
दी
गई
है
मेज़बाँ
को
उदासी
भी
हमारे
साथ
होगी
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Swapnil Tiwari
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तुम्हारा
ख़्वाब
भी
आए
तो
नींद
पूरी
हो
मैं
सो
तो
जाऊँगा
नींद
आने
की
दवा
लेकर
Swapnil Tiwari
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और
कम
याद
आओगी
अगले
बरस
तुम
अब
के
कम
याद
आई
हो
पिछले
बरस
से
Swapnil Tiwari
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उदासी
से
सजे
रहिए
कोई
रुत
हो
हरे
रहिए
पड़े
रहना
भी
अच्छा
है
मुहब्बत
में
पड़े
रहिए
रज़ाई
खींचिए
सर
तक
सहर
को
टालते
रहिए
वो
ऐसे
होंट
हैं
के
बस
हमेशा
चूमते
रहिए
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Swapnil Tiwari
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नींद
से
आ
कर
बैठा
है
ख़्वाब
मिरे
घर
बैठा
है
अक्स
मिरा
आईने
में
ले
कर
पत्थर
बैठा
है
पलकें
झुकी
हैं
सहरा
की
जिस
पे
समुंदर
बैठा
है
एक
बगूला
यादों
का
खा
कर
चक्कर
बैठा
है
उस
की
नींदों
पर
इक
ख़्वाब
तितली
बन
कर
बैठा
है
रात
की
टेबल
बुक
कर
के
चाँद
डिनर
पर
बैठा
है
अँधियारा
ख़ामोशी
की
ओढ़
के
चादर
बैठा
है
'आतिश'
धूप
गई
कब
की
घर
में
क्यूँँकर
बैठा
है
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Swapnil Tiwari
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