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Sohil Barelvi
munsif se apne haq men kya bole na-tawan phir
munsif se apne haq men kya bole na-tawan phir | मुन्सिफ़ से अपने हक़ में क्या बोले ना-तवाँ फिर
- Sohil Barelvi
मुन्सिफ़
से
अपने
हक़
में
क्या
बोले
ना-तवाँ
फिर
जब
एक
हो
गए
हों
दोनों
तरफ़
के
शाहिद
- Sohil Barelvi
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लहू
वतन
के
शहीदों
का
रंग
लाया
है
उछल
रहा
है
ज़माने
में
नाम-ए-आज़ादी
Firaq Gorakhpuri
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माँ
बाप
और
उस्ताद
सब
हैं
ख़ुदा
की
रहमत
है
रोक-टोक
उन
की
हक़
में
तुम्हारे
नेमत
Altaf Hussain Hali
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निगाह-ए-गर्म
क्रिसमस
में
भी
रही
हम
पर
हमारे
हक़
में
दिसम्बर
भी
माह-ए-जून
हुआ
Akbar Allahabadi
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न
जाने
ख़त्म
हुई
कब
हमारी
आज़ादी
तअल्लुक़ात
की
पाबंदियाँ
निभाते
हुए
Azhar Iqbal
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ओ
सखी
मन
उसका
तो
तन
भी
उसी
का
हक़
है
उसको
ग़ैर
ये
आँगन
न
चू
में
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Neeraj Neer
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मोहब्बत
की
तो
कोई
हद,
कोई
सरहद
नहीं
होती
हमारे
दरमियाँ
ये
फ़ासले,
कैसे
निकल
आए
Khalid Moin
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कोई
तो
सूद
चुकाए
कोई
तो
ज़िम्मा
ले
उस
इंक़लाब
का
जो
आज
तक
उधार
सा
है
Kaifi Azmi
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तो
डर
रहे
हैं
आप
कहीं
हक़
न
माँग
ले
यानी
कि
सबको
खौफ़
है
औरत
के
नाम
से
Abhishar Geeta Shukla
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मेरा
क़ातिल
ही
मेरा
मुंसिफ़
है
क्या
मिरे
हक़
में
फ़ैसला
देगा
Sudarshan Fakir
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मुझको
भी
ज़िद
करने
का
हक़
दो
साहब
मेरे
भीतर
भी
इक
बच्चा
रहता
है
Atul K Rai
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होते
हैं
मुझ
से
रू-ब-रू
आज़ार
जा-ब-जा
उस
पर
तेरे
सितम
हैं
मेरे
यार
जा-ब-जा
कार-ए-जहाँ
को
छोड़
तुम्हारी
तलाश
की
तुम
को
भी
हारे
ढूँढ़
के
सरकार
जा-ब-जा
ढूँढा
अकेले
तन्हा
हकीमों
को
शहर
भर
फिरता
रहा
अकेले
ही
बीमार
जा-ब-जा
सोहिल
न
जाने
इश्क़
में
कब
आएगा
वो
दिन
लैला
पुकारे
क़ैस
को
सरशार
जा-ब-जा
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Sohil Barelvi
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हम
किसी
काम
के
नहीं
सोहिल
काम
आते
हैं
काम
के
बंदे
Sohil Barelvi
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सभी
राज़-दाँ
हैं
जहाँ
में
हमारे
किसी
से
भी
अब
कोई
ख़तरा
नहीं
है
Sohil Barelvi
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उदासी
ने
कभी
तन्हा
मुझे
छोड़ा
नहीं
है
इसी
बाइस
ख़ुशी
से
आज
तक
रिश्ता
नहीं
है
मेरा
इक
दोस्त
अपना
है
फ़क़त
इतना
समझ
लो
सिवा
उस
के
कोई
दिल
के
क़रीब
अपना
नहीं
है
मेरा
चेहरा
तबस्सुम
से
ढका
देखा
सभी
ने
सितारा-साज़
पलकों
तक
कोई
पहुँचा
नहीं
है
जुनूँ
है
शर्त
मंज़िल
इश्क़
की
गर
चाहते
हो
कोई
फ़हम-ओ-फ़रासत
से
यहाँ
पहुँचा
नहीं
है
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Sohil Barelvi
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मैं
किसी
का
बुरा
चाहता
ही
नहीं
चाहना
छोड़िए
सोचता
ही
नहीं
ख़्वाब-हा-ख़्वाब
जो
मुझ
से
मिलता
रहा
यार
मैं
तो
उसे
जानता
ही
नहीं
ढूँढते
ढूँढते
थक
चुका
यार
मैं
अब
ख़ुशी
को
कहीं
ढूँढता
ही
नहीं
हैं
बहुत
से
भले
लोग
याँ
पे
मगर
कोई
मेरा
भला
चाहता
ही
नहीं
इस
सदाक़त
से
सब
लोग
महरूम
हैं
बे-सबब
मैं
कभी
बोलता
ही
नहीं
कोई
आह-ओ-फ़ुग़ाँ
से
है
महरूम
और
कोई
बज़्म-ए-तरब
देखता
ही
नहीं
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Sohil Barelvi
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