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Sohil Barelvi
koi jeene ki dhun men jee raha hai
koi jeene ki dhun men jee raha hai | कोई जीने की धुन में जी रहा है
- Sohil Barelvi
कोई
जीने
की
धुन
में
जी
रहा
है
मैं
जीवन
के
मआ'नी
पर
रुका
हूँ
- Sohil Barelvi
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मुझ
से
कहा
जिब्रील-ए-जुनूँ
ने
ये
भी
वही-ए-इलाही
है
मज़हब
तो
बस
मज़हब-ए-दिल
है
बाक़ी
सब
गुमराही
है
Majrooh Sultanpuri
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करे
जो
क़ैद
जुनूँ
को
वो
जाल
मत
देना
हो
जिस
में
होश
उसे
ऐसा
हाल
मत
देना
जो
मुझ
सेे
मिलने
का
तुमको
कभी
ख़याल
आए
तो
इस
ख़याल
को
तुम
कल
पे
टाल
मत
देना
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Kashif Adeeb Makanpuri
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ख़ुदी
को
कर
बुलंद
इतना
कि
हर
तक़दीर
से
पहले
ख़ुदा
बंदे
से
ख़ुद
पूछे
बता
तेरी
रज़ा
क्या
है
Allama Iqbal
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ये
कैसा
नश्शा
है
मैं
किस
अजब
ख़ुमार
में
हूँ
तू
आ
के
जा
भी
चुका
है
मैं
इंतिज़ार
में
हूँ
Muneer Niyazi
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तेरे
बग़ैर
ख़ुदा
की
क़सम
सुकून
नहीं
सफ़ेद
बाल
हुए
हैं
हमारा
ख़ून
नहीं
न
हम
ही
लौंडे
लपाड़ी
न
कच्ची
उम्र
का
वो
ये
सोचा
समझा
हुआ
इश्क़
है
जुनून
नहीं
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Shamim Abbas
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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पहले
कहता
है
जुनूँ
उसका
गिरेबान
पकड़
फिर
मेरा
दिल
मुझे
कहता
है
इधर
कान
पकड़
ऐसी
वहशत
भी
न
हो
घर
के
दरो
बाम
कहें
कोई
आवाज़
ही
ले
आ
कोई
मेहमान
पकड़
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Azbar Safeer
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परिंद
ऊँची
उड़ानों
की
धुन
में
रहता
है
मगर
ज़मीं
की
हदों
में
बसर
भी
करता
है
Khaleel Tanveer
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वही
मंज़िलें
वही
दश्त
ओ
दर
तिरे
दिल-ज़दों
के
हैं
राहबर
वही
आरज़ू
वही
जुस्तुजू
वही
राह-ए-पुर-ख़तर-ए-जुनूँ
Noon Meem Rashid
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मोहब्बत
नेक-ओ-बद
को
सोचने
दे
ग़ैर-मुमकिन
है
बढ़ी
जब
बे-ख़ुदी
फिर
कौन
डरता
है
गुनाहों
से
Arzoo Lakhnavi
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मैं
रोने
के
अलावा
कुछ
दिनों
से
पुरानी
चैट
पढ़कर
हँस
रहा
हूँ
Sohil Barelvi
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तुझ
में
देखी
है
बे-बसी
अपनी
मिलती
जुलती
है
ज़िंदगी
अपनी
इतने
अच्छे
हैं
दोस्त
हम
दोनों
सब
को
खलती
है
दोस्ती
अपनी
एक
दिन
रब
भी
मेहरबाँ
होगा
रंग
लाएगी
बंदगी
अपनी
यूँँ
जलाएँगे
प्यार
के
दीपक
दूर
तक
होगी
रौशनी
अपनी
फिर
न
ऐसे
मरेंगे
दीवाने
काम
आएगी
ख़ुद-कुशी
अपनी
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Sohil Barelvi
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हाए
उस
शख़्स
को
कैसे
ये
बताऊँ
'सोहिल'
उस
से
पहले
मिरी
आँखों
में
उजाला
कम
था
Sohil Barelvi
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नहीं
समझो
ज़रा
सा
इश्क़
हूँ
मैं
यक़ीं
मानो
सरापा
इश्क़
हूँ
मैं
ख़ुदास
मैं
ख़ुदा
मुझ
से
जुड़ा
है
तो
ये
मतलब
ख़ुदा
का
इश्क़
हूँ
मैं
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Sohil Barelvi
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तस्वीर
तो
रही
नहीं
तस्वीर
की
जगह
इक
ख़त
ही
पढ़
रहा
हूँ
मैं
अब
तो
जला
हुआ
Sohil Barelvi
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