jab bhi ghar ke dar-o-deewar se uktaate hain | जब भी घर के दर-ओ-दीवार से उक्ताते हैं

  - Sohil Barelvi
जबभीघरकेदर-ओ-दीवारसेउक्तातेहैं
लोगदरियाकीतरफ़ख़ुदहीचलेजातेहैं
जोचलेजातेनहींआतेदोबारामुड़कर
वहमआताहैफ़क़तलोगनहींआतेहैं
फिरसमझतेहैंइसीसम्तहैअपनासबकुछ
आपकीसम्तहीजबयारक़दमजातेहैं
वाक़िआहैयेतसव्वुरकेजहाँकाजानाँ
अपनीऊँगलीसेतिरीज़ुल्फ़कोसहलातेहैं
हमगरीबोंकीतमन्नाएँहैंबेवाजैसी
चाहतेरहतेहैंकुछलुत्फ़नहींपातेहैं
संग-ए-मरमरकीसड़करासनहींआतीहमें
ठोकरेंजानकेहमलोगयहाँखातेहैं
दिलकोतकलीफ़तोहोतीहैमगरहमसोहिल
एकक़तराभीनिगाहोंमेंनहींलातेहैं
  - Sohil Barelvi
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