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karan singh rajput
phool kitaabon men chhupaaye hue
phool kitaabon men chhupaaye hue | फूल किताबों में छुपाये हुए
- karan singh rajput
फूल
किताबों
में
छुपाये
हुए
तख्ती
पे
वो
दिल
बनाये
हुए
कितने
दिन
हो
गए
है
यार
तुझको
गले
से
लगाए
हुए
- karan singh rajput
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दिन
सलीक़े
से
उगा
रात
ठिकाने
से
रही
दोस्ती
अपनी
भी
कुछ
रोज़
ज़माने
से
रही
Nida Fazli
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हैराँ
मैं
भी
हूँ
दोस्त
यूँँ
बालों
में
गजरा
देखकर
ये
फूल
आख़िर
कबसे
फूलों
को
पहनने
लग
गया
Neeraj Neer
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भले
ही
प्यार
हो
या
हिज्र
हो
या
फिर
सियासत
हो
कुछ
ऐसे
दोस्त
थे
हर
बात
पर
अश'आर
कहते
थे
Siddharth Saaz
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अब
उस
सेे
दोस्ती
है
जिस
सेे
कल
मुहब्बत
थी
अब
इस
सेे
ज़्यादा
बुरा
वक़्त
कुछ
नहीं
है
दोस्त
Vishal Singh Tabish
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बादलों
में
से
छनता
हुआ
नूर
देख
ऐसी
रौशन
जबीं
है
मेरे
यार
की
Afzal Ali Afzal
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इस
से
पहले
कि
बे-वफ़ा
हो
जाएँ
क्यूँँ
न
ऐ
दोस्त
हम
जुदा
हो
जाएँ
Ahmad Faraz
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शाम
ढलने
से
फ़क़त
शाम
नहीं
ढलती
है
उम्र
ढल
जाती
है
जल्दी
पलट
आना
मेरे
दोस्त
Ashfaq Nasir
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जो
दोस्त
हैं
वो
माँगते
हैं
सुलह
की
दु'आ
दुश्मन
ये
चाहते
हैं
कि
आपस
में
जंग
हो
Lala Madhav Ram Jauhar
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दुश्मनी
कर
मगर
उसूल
के
साथ
मुझ
पर
इतनी
सी
मेहरबानी
हो
मेरे
में'यार
का
तक़ाज़ा
है
मेरा
दुश्मन
भी
ख़ानदानी
हो
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Akhtar Shumar
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रातें
किसी
याद
में
कटती
हैं
और
दिन
दफ़्तर
खा
जाता
है
दिल
जीने
पर
माएल
होता
है
तो
मौत
का
डर
खा
जाता
है
सच
पूछो
तो
'तहज़ीब
हाफ़ी'
मैं
ऐसे
दोस्त
से
आज़िज़
हूँ
मिलता
है
तो
बात
नहीं
करता
और
फोन
पे
सर
खा
जाता
है
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Tehzeeb Hafi
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ज़बाँ
पे
आती
है
जब
भी
कभी
उस
यार
की
बातें
नहीं
होती
है
मुझ
सेे
फिर
तो
ये
बेकार
की
बातें
ग़ज़ल
लिखने
भी
बैठूँ
तो
यही
होता
है
मेरे
साथ
कभी
चेहरे
की
उसके
तो
कभी
रुख़सार
की
बातें
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karan singh rajput
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शहर
में
तेरे
सब
गुमनाम
मिलते
हैं
हवाओं
में
ही
अब
पैग़ाम
मिलते
हैं
बिछड़ने
के
ब’अद
भी
तुझ
सेे
ये
है
हाल
जिधर
जाऊँ
तेरे
हमनाम
मिलते
हैं
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karan singh rajput
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पहले
मुझे
वो
सब
सेे
अजीज
समझता
था
दोस्त
अब
तो
वो
बात
करना
भी
ज़रूरी
नहीं
समझता
karan singh rajput
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किया
जो
साथ
उसके
मैंने,
मुझको
ये
लगा
दिल
से
उतर
जाऊँगा
लेकिन
नईं
karan singh rajput
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कमज़ोर
ना
जानो
दिए
को
ऐं
-
हवाओं
इस
तरह
ख़ामोश
हैं
तो
क्या
बग़ावत
भी
हो
सकती
है
कभी
karan singh rajput
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