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karan singh rajput
apni kahaanii phir kabhi poori sahi
apni kahaanii phir kabhi poori sahi | अपनी कहानी फिर कभी पूरी सही
- karan singh rajput
अपनी
कहानी
फिर
कभी
पूरी
सही
मुझ
सेे
बिछड़ना
तेरी
मजबूरी
सही
- karan singh rajput
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बहुत
हसीन
सही
सोहबतें
गुलों
की
मगर
वो
ज़िंदगी
है
जो
काँटों
के
दरमियाँ
गुज़रे
Jigar Moradabadi
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बोसा
जो
रुख़
का
देते
नहीं
लब
का
दीजिए
ये
है
मसल
कि
फूल
नहीं
पंखुड़ी
सही
Sheikh Ibrahim Zauq
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अब
ज़िन्दगी
से
कोई
मिरा
वास्ता
नहीं
पर
ख़ुद-कुशी
भी
कोई
सही
रास्ता
नहीं
Rahul
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हमको
हकीम
ने
ही
किया
ठीक
दोस्तों
हम
पर
किसी
के
लम्स
ने
जादू
नहीं
किया
Tanoj Dadhich
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मैं
आज
जो
भी
कहूँगा
तुम
सेे
वो
सच
है
जानम
ये
जान
लो
तुम
मिरी
ग़ज़ल
के
हरेक
मिसरे
से
मेरी
चाहत
झलक
रही
है
Amaan Pathan
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दो
गज़
सही
मगर
ये
मेरी
मिल्कियत
तो
है
ऐ
मौत
तूने
मुझे
ज़मींदार
कर
दिया
Rahat Indori
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मेरे
सीने
में
नहीं
तो
तेरे
सीने
में
सही
हो
कहीं
भी
आग
लेकिन
आग
जलनी
चाहिए
Dushyant Kumar
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सच
बताओ
कि
सच
यही
है
क्या
साँस
लेना
ही
ज़िंदगी
है
क्या
कुछ
नया
काम
कर
नई
लड़की
इश्क़
करना
है
बावली
है
क्या
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Vikram Gaur Vairagi
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क़त्अ
कीजे
न
त'अल्लुक़
हम
से
कुछ
नहीं
है
तो
अदावत
ही
सही
Mirza Ghalib
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सच
की
डगर
पे
जब
भी
रक्खे
क़दम
किसी
ने
पहले
तो
देखी
ग़ुर्बत
फिर
तख़्त-ओ-ताज
देखा
Amaan Pathan
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पन्ने
पलटते
रहते
हैं
अखबार
के
हम
इन
दिनों
आती
नहीं
अब
चाय
टेबल
पर
जो
तेरे
हाथ
की
karan singh rajput
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मैं
बिछड़कर
तुझ
सेे
कैसे
जीऊँगा
इक
यही
डर
खाए
जाता
है
मुझे
karan singh rajput
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खुली
आँखों
में
साल
गुज़रा
कई
रातों
में
साल
गुज़रा
तेरी
बाहों
में
दिन
गुज़ारे
तेरी
बातों
में
साल
गुज़रा
मुलाक़ात
इक
न
हुई
और
यूँँ
ही
वादों
में
साल
गुज़रा
भला
किस
तरह
भूल
जाऊँ
मैं
जिन
बातों
में
साल
गुज़रा
‘करन‘
किस
सेे
जाकर
कहे
हम
तेरी
यादों
में
साल
गुज़रा
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karan singh rajput
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शहर
में
तेरे
सब
गुमनाम
मिलते
हैं
हवाओं
में
ही
अब
पैग़ाम
मिलते
हैं
बिछड़ने
के
ब’अद
भी
तुझ
सेे
ये
है
हाल
जिधर
जाऊँ
तेरे
हमनाम
मिलते
हैं
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karan singh rajput
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वैसे
तो
अपना
दुख
मैं
छुपा
लेता
हूँ
पर
वो
जब
पूछती
है
बता
देता
हूँ
karan singh rajput
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