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karan singh rajput
ye jo kahaanii hai haqeeqat bhi ho sakti hai kabhi
ye jo kahaanii hai haqeeqat bhi ho sakti hai kabhi | ये जो कहानी है हक़ीक़त भी हो सकती है कभी
- karan singh rajput
ये
जो
कहानी
है
हक़ीक़त
भी
हो
सकती
है
कभी
के
दोस्ती
अपनी
मुहब्ब्त
भी
हो
सकती
है
कभी
कमजोर
ना
जानो
दिए
को
ऐं-हवाओं
इस
तरह
ख़ामोश
हैं
तो
क्या
बग़ावत
भी
हो
सकती
है
कभी
तुम
जो
मुहब्ब्त
को
ख़ुदा
कहते
हो
ऐसा
ना
कहो
ये
जो
मुहब्ब्त
है
क़यामत
भी
हो
सकती
है
कभी
- karan singh rajput
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रहबर
भी
ये
हमदम
भी
ये
ग़म-ख़्वार
हमारे
उस्ताद
ये
क़ौमों
के
हैं
में'मार
हमारे
Unknown
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सीने
लगाऊँ
ग़ैर
को
तो
पूछता
है
दिल
किसकी
जगह
थी
और
ये
सीने
पे
कौन
है
Ankit Maurya
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इतनी
शोहरत
तो
मेरी
आज
भी
इस
शहर
में
है
एक
पत्ता
न
हिले
मेरी
इजाज़त
के
बग़ैर
Mukesh Jha
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आदतन
उसके
लिए
फूल
ख़रीदे
वरना
नहीं
मालूम
वो
इस
बार
यहाँ
है
कि
नहीं
Abbas Tabish
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आए
थे
हँसते
खेलते
मय-ख़ाने
में
'फ़िराक़'
जब
पी
चुके
शराब
तो
संजीदा
हो
गए
Firaq Gorakhpuri
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अदाकार
के
कुछ
भी
बस
का
नहीं
है
मोहब्बत
है
ये
कोई
ड्रामा
नहीं
है
जिसे
तेरी
आँखें
बताती
हैं
रस्ता
वो
राही
कहीं
भी
पहुँचता
नहीं
है
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Zubair Ali Tabish
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कल
रात
बहुत
ग़ौर
किया
है
सो
हम
उसकी
तय
करके
उठे
हैं
कि
तमन्ना
ना
करेंगे
इस
बार
वो
तल्ख़ी
है
की
रूठे
भी
नहीं
हम
अबके
वो
लड़ाई
है
के
झगड़ा
ना
करेंगे
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Jaun Elia
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सगी
बहनों
का
जो
रिश्ता
रिश्ता
है
उर्दू
और
हिन्दी
में
कहीं
दुनिया
की
दो
ज़िंदा
ज़बानों
में
नहीं
मिलता
Munawwar Rana
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ये
मख़मली
गद्दे
तो
तुझको
ही
मुबारक
हों
ऐ
दोस्त
मुझे
बस
माँ
की
गोद
ही
काफ़ी
है
Harsh saxena
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ग़ज़ल
पूरी
न
हो
चाहे,
मग़र
इतनी
सी
ख़्वाहिश
है
मुझे
इक
शे'र
कहना
है
तेरे
रुख़्सार
की
ख़ातिर
Siddharth Saaz
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भले
ही
भूल
जाऊँ
मैं
तुम्हें
कभी
ऐ
मेरी
जाँ
मगर
तेरे
ये
ज़ख़्मो
को
भुला
नहीं
सकूँगा
मैं
karan singh rajput
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तूने
कैसे
सोचा
के
आबाद
रह
जाऊँगा
मैं
सबके
होंठों
पे
बनी
फ़रियाद
रह
जाऊँगा
मैं
तुम
भी
मुझको
भूल
जाओगी
किसी
दिन
देखना
हादसा
नईं
हूँ
कोई
जो
याद
रह
जाऊँगा
मैं
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karan singh rajput
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बुढापे
में
उसी
ने
हाथ
नईं
थामा
किसी
का
भी
कि
बचपन
में
जिसे
सब
सेे
ज़ियादा
प्यार
मिलता
था
karan singh rajput
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खुली
आँखों
में
साल
गुज़रा
कई
रातों
में
साल
गुज़रा
तेरी
बाहों
में
दिन
गुज़ारे
तेरी
बातों
में
साल
गुज़रा
मुलाक़ात
इक
न
हुई
और
यूँँ
ही
वादों
में
साल
गुज़रा
भला
किस
तरह
भूल
जाऊँ
मैं
जिन
बातों
में
साल
गुज़रा
‘करन‘
किस
सेे
जाकर
कहे
हम
तेरी
यादों
में
साल
गुज़रा
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karan singh rajput
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मुझे
तुम
नया
ज़ख़्म
दे
दो
मेरी
जाँ
बड़े
दिन
से
कोई
ग़ज़ल
नईं
हुई
है
karan singh rajput
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