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Shariq Kaifi
manaa liya hai use phir usii ki sharton par
manaa liya hai use phir usii ki sharton par | मना लिया है उसे फिर उसी की शर्तों पर
- Shariq Kaifi
मना
लिया
है
उसे
फिर
उसी
की
शर्तों
पर
तमाम
उम्र
किसे
रूठने
की
फुरसत
थी
- Shariq Kaifi
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यही
अंजाम
अक्सर
हम
ने
देखा
है
मोहब्बत
का
कहीं
राधा
तरसती
है
कहीं
कान्हा
तरसता
है
Virendra Khare Akela
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शरीफ़
इंसान
आख़िर
क्यूँ
इलेक्शन
हार
जाता
है
किताबों
में
तो
ये
लिक्खा
था
रावन
हार
जाता
है
Munawwar Rana
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सोचता
हूँ
कि
उस
की
याद
आख़िर
अब
किसे
रात
भर
जगाती
है
Jaun Elia
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ये
रख
रखाव
कभी
ख़त्म
होने
वाला
नहीं
बिछड़ते
वक़्त
भी
तुझको
गुलाब
दूँगा
मैं
Khurram Afaq
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मैं
तमाम
दिन
का
थका
हुआ
तू
तमाम
शब
का
जगा
हुआ
ज़रा
ठहर
जा
इसी
मोड़
पर
तेरे
साथ
शाम
गुज़ार
लूँ
Bashir Badr
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या'नी
कि
इश्क़
अपना
मुकम्मल
नहीं
हुआ
गर
मैं
तुम्हारे
हिज्र
में
पागल
नहीं
हुआ
वो
शख़्स
सालों
बाद
भी
कितना
हसीन
है
वो
रंग
कैनवस
पे
कभी
डल
नहीं
हुआ
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Kushal Dauneria
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हर
एक
चौखट
खुली
हुई
थी
हर
इक
दरीचा
खुला
हुआ
था
कि
उसकी
आमद
पे
दर
यहाँ
तक
कि
बेघरों
का
खुला
हुआ
था
ये
तेरी
हम्म
ने
हमें
ही
उलझन
में
डाल
रक्खा
है
वरना
हम
पर
तमाम
साइंस
के
फ़लसफ़ों
का
हर
एक
चिट्ठा
खुला
हुआ
था
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Saad Ahmad
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उस
के
होंटों
पे
रख
के
होंट
अपने
बात
ही
हम
तमाम
कर
रहे
हैं
Jaun Elia
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तमाम
होश
ज़ब्त
इल्म
मस्लहत
के
बाद
भी
फिर
इक
ख़ता
मैं
कर
गया
था
माज़रत
के
बाद
भी
Pallav Mishra
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जिस
दिन
तुम्हारे
ख़त
का
मुझे
इंतिज़ार
था
उस
दिन
तमाम
पंछी
कबूतर
लगे
मुझे
Ali Rumi
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जाने
से
कोई
फ़र्क़
ही
उसके
नहीं
पड़ा
क्या
क्या
समझ
रहा
था
बिछड़ने
के
डर
को
मैं
Shariq Kaifi
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ये
भी
इक
तरकीब
है
दुश्मन
से
लड़ने
की
गले
लगा
लो
जिस
पर
वार
नहीं
कर
सकते
Shariq Kaifi
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रोज़
का
इक
मश्ग़ला
कुछ
देर
का
उस
गली
का
रास्ता
कुछ
देर
का
बात
क्या
बढ़ती
कि
जब
मा’लूम
था
साथ
है
कुछ
दूर
का
कुछ
देर
का
उ’म्र
भर
को
एक
कर
जाता
हमें
हौसला
तेरा
मिरा
कुछ
देर
का
फिर
मुझे
दुनिया
में
शामिल
कर
गया
ख़ुद
से
मेरा
वास्ता
कुछ
देर
का
अब
नहीं
तो
कल
ये
रिश्ता
टूटता
फ़र्क़
क्या
पड़ता
भला
कुछ
देर
का
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Shariq Kaifi
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निगाह
नीची
हुई
है
मेरी
ये
टूटने
की
घड़ी
है
मेरी
पलट
पलट
कर
जो
देखता
हूँ
कोई
सदा
अन-सुनी
है
मेरी
ये
काम
दोनों
तरफ़
हुआ
है
उसे
भी
आदत
पड़ी
है
मेरी
तमाम
चेहरों
को
एक
कर
के
अजीब
सूरत
बनी
है
मेरी
वहीं
पे
ले
जाएगी
ये
मिट्टी
जहाँ
सवारी
खड़ी
है
मेरी
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Shariq Kaifi
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साल
के
आख़िरी
दिन
उसने
दिया
वक़्त
हमें
अब
तो
ये
साल
कई
साल
नहीं
गुज़रेगा
Shariq Kaifi
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