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shampa andaliib
hansta hi ja raha mujhe har koii dekh kar
hansta hi ja raha mujhe har koii dekh kar | हँसता ही जा रहा मुझे हर कोई देख कर
- shampa andaliib
हँसता
ही
जा
रहा
मुझे
हर
कोई
देख
कर
घंटों
से
मुब्तिला
हूँ
मैं
कार-ए-फ़ुज़ूल
में
- shampa andaliib
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किरदार
के
हिसाब
से
चलती
रहूँगी
मैं
लाज़िम
है
मुझ
को
राह
में
कुछ
मुश्किलें
मिलें
shampa andaliib
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मुझ
को
चाबी
मिले
तो
हो
मालूम
क्या
छुपाया
गया
है
कमरे
में
shampa andaliib
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छोड़
कर
हम
को
हर
जगह
हैं
वो
कल
तलक
जो
फ़क़त
हमारे
थे
shampa andaliib
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थोड़ी
बहुत
भी
नफ़रत
दिल
में
है
तो
मत
रक्खो
धीरे
धीरे
दीमक
लकड़ी
को
खा
जाती
है
shampa andaliib
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हमारी
आँखों
का
काजल
बहा
कर
जो
आया
वो
गया
दिल
को
दुखा
कर
हमारी
कौन
सुनता
चल
दिए
सब
हमें
तकलीफ़
फिर
अपनी
सुना
कर
वो
पंछी
फिर
दोबारा
उड़
न
पाए
किए
आज़ाद
जो
क़ैदी
बना
कर
ख़ुशी
बाँटो
ख़ुशी
से
और
सोचो
किसी
को
क्या
मिला
है
दिल
दुखा
कर
अगर
मुजरिम
हो
तो
फिर
जुर्म
अपना
करो
मंज़ूर
अब
सर
को
झुका
कर
हमारी
आँखें
तो
तकती
रहीं
पर
नहीं
देखा
किसी
ने
दूर
जा
कर
चलो
भरते
हैं
ख़ालीपन
ये
शम्पा
दर-ओ-दीवार
को
बातें
सुना
कर
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shampa andaliib
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