मौज-ए-ग़म इस लिए शायद नहीं गुज़री सर से

  - Shakeb Jalali
मौज-ए-ग़मइसलिएशायदनहींगुज़रीसरसे
मैंजोडूबातोउभरूँगाकभीसागरसे
औरदुनियासेभलाईकासिलाक्यामिलता
आइनामैंनेदिखायाथाकिपत्थरबरसे
कितनीगुम-सुममेरेआँगनसेसबागुज़रीहै
इकशररभीउड़ारूहकीख़ाकिस्तरसे
प्यारकीजोतसेघरघरहैचराग़ाँवर्ना
एकभीशम्अ'रौशनहोहवाकेडरसे
उड़तेबादलकेतआ'क़ुबमेंफिरोगेकबतक
दर्दकीधूपमेंनिकलानहींकरतेघरसे
कितनीरानाइयाँआबादहैंमेरेदिलमें
इकख़राबानज़रआताहैमगरबाहरस
वादी-ए-ख़्वाबमेंउसगुलकागुज़रक्यूँँहुआ
रातभरआतीरहीजिसकीमहकबिस्तरसे
तान-ए-अग़्यारसुनेंआपख़मोशीसे'शकेब'
ख़ुदपलटजातीहैटकराकेसदापत्थरसे
  - Shakeb Jalali
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