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Shahanwaz Ansari
chamkega kab meraa bhi naseeba aqaa
chamkega kab meraa bhi naseeba aqaa | चमकेगा कब मेरा भी नसीबा आक़ा
- Shahanwaz Ansari
चमकेगा
कब
मेरा
भी
नसीबा
आक़ा
मैं
पहुँचूँ
दर
पर
कहता
आक़ा
आक़ा
कुछ
भी
तो
मेरे
पास
नहीं
बख़्शिश
को
हाँ
इतना
ज़रूर
कि
हूँ
मैं
तुम्हारा
आक़ा
- Shahanwaz Ansari
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रौशनी
से
वास्ता
क्या
मेरा
तीरगी
ही
है
नसीबा
मेरा
तू
नहीं
था
मेरी
क़िस्मत
शायद
फिर
भला
कैसे
तू
होता
मेरा
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Shahanwaz Ansari
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जब
भी
वो
कभी
आँखों
के
सामने
आता
है
दिल
पागल
है
जाने
क्यूँ
शोर
मचाता
है
पाया
ही
नहीं
है
जिस
को
कभी
फिर
भी
ये
दिल
हैरत
है
उसको
खोने
का
शोक
मनाता
है
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Shahanwaz Ansari
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यूँँ
मयकशी
तो
लगती
ख़राब
है
पिलाओ
तुम
तो
शरबत
शराब
है
तू
ज़िंदगी
में
है
फिर
तो
सब
हसीं
भला
तिरे
होते
क्या
ख़राब
है
तुम्हारे
होने
से
ही
है
ज़िन्दगी
तुम्हारे
बिन
जीना
तो
अज़ाब
है
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Shahanwaz Ansari
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जिस
भी
शब
ख़्वाब
में
मैंने
देखा
तुझे
सुब्ह
ऑंखें
खुली
मुस्कुराते
हुए
Shahanwaz Ansari
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चाँद
तारे
और
ज़मीं
आसमाॅं
ख़ामोश
है
देख
कर
तुझको
ये
सारा
जहाँ
ख़ामोश
है
सोचता
था
मैं
बयाँ
करता
हाल-ए-दिल
तुम्हें
तुम
नज़र
के
पास
हो
तो
ज़बाँ
ख़ामोश
है
काश
मेरे
दिल
की
ही
इक
दफ़ा
तो
सुनते
तुम
चुप
ज़बाँ
है
दिल
मिरा
तो
कहाँ
ख़ामोश
है
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Shahanwaz Ansari
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