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SWAPNIL YADAV 'NIL'
bagiche men humeen hain ga rahe hain
bagiche men humeen hain ga rahe hain | बग़ीचे में हमीं हैं गा रहे हैं
- SWAPNIL YADAV 'NIL'
बग़ीचे
में
हमीं
हैं
गा
रहे
हैं
ये
पंछी
फिर
किसे
भरमा
रहे
है
ख़ुदा
हम
मान
कर
तेरी
तमन्ना
तिरी
दुनिया
से
तन्हा
जा
रहे
हैं
अभी
महकेगा
कुछ
दिन
ये
बदन
भी
हम
उसके
गाँव
होकर
आ
रहे
हैं
कहा
था
मौत
पर
मिलना
रहेगा
कफ़न
के
कोट
हम
सिलवा
रहे
हैं
सिपाही
हैं
अगर
इंसान
ही
तो
हम
इनसे
जंग
क्यूँ
लड़वा
रहे
हैं
कभी
जो
ज़िन्दगी
रस्ते
भुला
दे
चलो
जिस
ओर
दरिया
जा
रहे
हैं
- SWAPNIL YADAV 'NIL'
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आपका
अक्स
मुझ
में
अमृत
था
आपका
हिज्र
दिल
पे
आरी
है
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तुम्हारे
साथ
जो
हँसता
बहलता
एक
लड़का
है
पलटकर
रो
भी
पड़ता
है,
मगर
तुझ
सेे
नहीं
कहता
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न
लौटोगे
कभी
तुम
जानता
हूँ
ये
मेरी
ज़िंदगी
है
फ़िल्म
थोड़ी
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ये
कभी
मुख़्तसर
नहीं
आती
ज़िन्दगी
पर
नज़र
नहीं
आती
आपके
याँ
ही
मौत
मुर्दों
को
आती
होगी
इधर
नहीं
आती
ग़म
यही
है
कि
आह
अब
मेरे
जिस्म
को
चीर
कर
नहीं
आती
मौत
भी
दिल
दुखायगी
मेरा
मौत
भी
वक़्त
पर
नहीं
आती
तब
मुझे
चैन
ही
नहीं
पड़ता
तीरगी
जब
नज़र
नहीं
आती
वो
कोई
रेल
है
कि
रौनक
है
गुम
है,
मेरे
शहर
नहीं
आती
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है
आना
गर
हमारी
ज़िंदगी
में
हमें
समझा
करेगा
ख़ामुशी
में
कहानीकार
को
समझा
रहा
हूँ
कोई
किरदार
मारो
आख़िरी
में
करोगे
क्या
अगर
जो
लौट
आया
वो
भूला
नाम
फिर
से
बन्दगी
में
मैं
दुनिया
जीतना
तो
चाहता
हूँ
और
उसको
भी
जो
है
रहता
इसी
में
वफ़ा
के
पैरहन
को
ओढ़
करके
बदन
रौशन
हुए
दो
तीरगी
में
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