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Shaad Imran
dard-e-dil ki davaa nahin hoti
dard-e-dil ki davaa nahin hoti | दर्द-ए-दिल की दवा नहीं होती
- Shaad Imran
दर्द-ए-दिल
की
दवा
नहीं
होती
इश्क़
में
इल्तिजा
नहीं
होती
बना
देने
से
डर
जहन्नुम
का
बंदगी
या
ख़ुदा
नहीं
होती
ज़िन्दगी
बे-वफ़ा
ही
होती
है
मौत
पर
बे-वफ़ा
नहीं
होती
कुछ
तो
गुज़री
है
तेरे
दिल
पे
'शाद'
शा'इरी
बेवजह
नहीं
होती
- Shaad Imran
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भले
हैं
फ़ासले
क़ुर्बत
से
ख़ौफ़
लगता
है
ये
क्या
बला
है
जो
ऐसी
विरानी
क़ैद
हुई
Prashant Beybaar
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भूचाल
की
धमकी
का
अगर
डर
है
तो
लोगों
इन
कच्चे
मकानों
को
गिरा
क्यूँ
नहीं
देते
Gyan Prakash Vivek
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मौत
को
हम
ने
कभी
कुछ
नहीं
समझा
मगर
आज
अपने
बच्चों
की
तरफ़
देख
के
डर
जाते
हैं
Shakeel Jamali
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हुस्न
ने
शौक़
के
हंगा
में
तो
देखे
थे
बहुत
इश्क़
के
दावा-ए-तक़दीस
से
डर
जाना
था
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Asrar Ul Haq Majaz
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कोहरा
तो
इस
उदासी
का
घना
है
और
सबका
दिल
भी
पत्थर
का
बना
है
रोने
से
मन
हल्का
होता
होगा
लेकिन
मैं
तो
लड़का
हूँ,
मुझे
रोना
मना
है
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Daqiiq Jabaali
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आ
जाए
कौन
कब
कहाँ
कैसी
ख़बर
के
साथ
अपने
ही
घर
में
बैठा
हुआ
हूँ
मैं
डर
के
साथ
Pratap Somvanshi
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वही
मंज़िलें
वही
दश्त
ओ
दर
तिरे
दिल-ज़दों
के
हैं
राहबर
वही
आरज़ू
वही
जुस्तुजू
वही
राह-ए-पुर-ख़तर-ए-जुनूँ
Noon Meem Rashid
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तमाम
शहर
को
तारीकियों
से
शिकवा
है
मगर
चराग़
की
बैअत
से
ख़ौफ़
आता
है
Aziz Nabeel
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ये
जो
दीवार
अँधेरों
ने
उठा
रक्खी
है
मेरा
मक़्सद
इसी
दीवार
में
दर
करना
है
Azm Shakri
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मैं
कैसे
मान
लूँ
कि
इश्क़
बस
इक
बार
होता
है
तुझे
जितनी
दफ़ा
देखूँ
मुझे
हर
बार
होता
है
तुझे
पाने
की
हसरत
और
डर
ना-कामियाबी
का
इन्हीं
दो
तीन
बातों
से
ये
दिल
दो
चार
होता
है
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Bhaskar Shukla
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आजकल
हम
जफ़ा
पे
लिखते
हैं
यानी
तेरी
अदा
पे
लिखते
हैं
दिल
कभी
दीवार
और
कभी-कभी
तो
हम
तिरा
नाम
हवा
पे
लिखते
हैं
ज़िन्दगी
खेल
नहीं
पतंगों
का
चलो
ये
आसमाँ
पे
लिखते
हैं
आज
फिर
याद
घर
की
आई
है
आज
फिर
कुछ
माँ
पे
लिखते
हैं
'शाद'
क्या
दौर
आया
शा'इरी
का
लोग
सिर्फ़
बे-वफ़ा
पे
लिखते
हैं
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Shaad Imran
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तेरे
आगे
कोई
सूरत
न
चले
मेरी
दिल
पे
कोई
हिम्मत
न
चले
कभी
तुम
भी
तो
मुझ
पे
ग़ज़ल
लिखो
यूँँ
एक
तरफ़ा
तो
उल्फ़त
न
चले
सुना
हो
जाएगी
वो
नीस्त-नाबुद
नबी
के
क़दमों
पे
जो
उम्मत
न
चले
जिश्त
उसकी
राएगाँ
ही
गई
गाम
जिसके
रह-ए-मोहब्बत
न
चले
हाए
तेरे
दौर
का
भी
इश्क़
'शाद'
वाट्सऐप
चले
है
पर
ख़त
न
चले
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Shaad Imran
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जितने
अपने
हैं
सब
पराए
हैं
बात
जानी
जब
ज़ख़्म
खाए
हैं
ये
सब
शराबी
कोई
और
नहीं
जाँ
तेरे
ठुकराए,
तेरे
सताए
हैं
ख़ून
थूका
तेरे
जाने
के
ग़म
मैं
हमनें
सिर्फ़
आँसू
नहीं
बहाए
हैं
मस्जिद
एक
रोज़
बुलाया
वाईज
ने
हमने
कह
दिया
नहीं
नहाए
हैं
मौत
पढ़ती
है
काम
करने
में
'शाद'
सिर्फ़
बातें
ही
बनाए
हैं
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Shaad Imran
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मैं
न
अच्छा
न
बुरा
निकला
मुझ
सेे
हर
शख़्स
क्यूँँ
ख़फ़ा
निकला
रहा
भलाई
का
ज़माना
नहीं
यही
हर
बार
तजुर्बा
निकला
जिसको
देखा
नहीं
किसी
ने
कभी
ये
ग़ज़ब
है
कि
वो
ख़ुदा
निकला
चाहने
वालों
में
तेरे
सब
सेे
अव्वल
मेरा
ही
नाम
हर
दफ़ा
निकला
देख
कर
होश
खो
बैठी
यशोदा
लाल
के
मुँह
में
कहकशां
निकला
'शाद'
तेरा
इश्क़
एक
तरफ़ा
था
फिर
क्यूँँ
कहना
वो
बे-वफ़ा
निकला
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Shaad Imran
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मेरे
हाथों
में
अपना
हाथ
रखकर
कहा
उसने
कभी
ये
हाथ
तो
न
छोड़ोगे
Shaad Imran
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