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Sayeed Khan
karna jo tha kar gaya hooñ
karna jo tha kar gaya hooñ | करना जो था कर गया हूँ
- Sayeed Khan
करना
जो
था
कर
गया
हूँ
आख़िरी
हद
पर
गया
हूँ
जब्र
होता
मुझ
पर
इतना
ज़ुल्म
जितना
कर
गया
हूँ
- Sayeed Khan
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तबक़ों
में
रंग-ओ-नस्ल
के
उलझा
के
रख
दिया
ये
ज़ुल्म
आदमी
ने
किया
आदमी
के
साथ
Bakhtiyar Ziya
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जाने
क्या
क्या
ज़ुल्म
परिंदे
देख
के
आते
हैं
शाम
ढले
पेड़ों
पर
मर्सिया-ख़्वानी
होती
है
Afzal Khan
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ये
तो
बढ़ती
ही
चली
जाती
है
मीआद-ए-सितम
ज़ुज़
हरीफ़ान-ए-सितम
किस
को
पुकारा
जाए
वक़्त
ने
एक
ही
नुक्ता
तो
किया
है
तालीम
हाकिम-ए-वक़त
को
मसनद
से
उतारा
जाए
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Jaun Elia
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ज़ालिम
था
वो
और
ज़ुल्म
की
आदत
भी
बहुत
थी
मजबूर
थे
हम
उस
से
मोहब्बत
भी
बहुत
थी
Kaleem Aajiz
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डाली
है
ख़ुद
पे
ज़ुल्म
की
यूँँ
इक
मिसाल
और
उसके
बग़ैर
काट
दिया
एक
साल
और
Subhan Asad
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क्या
सितम
करते
हैं
मिट्टी
के
खिलौने
वाले
राम
को
रक्खे
हुए
बैठे
हैं
रावण
के
क़रीब
Asghar Mehdi Hosh
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रोने
को
तो
ज़िंदगी
पड़ी
है
कुछ
तेरे
सितम
पे
मुस्कुरा
लें
Firaq Gorakhpuri
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टक
गोर-ए-ग़रीबाँ
की
कर
सैर
कि
दुनिया
में
उन
ज़ुल्म-रसीदों
पर
क्या
क्या
न
हुआ
होगा
Meer Taqi Meer
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इस
गए
साल
बड़े
ज़ुल्म
हुए
हैं
मुझ
पर
ऐ
नए
साल
मसीहा
की
तरह
मिल
मुझ
से
Sarfraz Nawaz
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है
ये
कैसा
सितम
मौला
ये
हैं
दुश्वारियाँ
कैसी
जहाँ
पर
रोना
था
हमको
वहीं
पर
मुस्कुराना
है
Aqib khan
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सुननी
है
मुझको
तिरी
अब
धड़कनें
फोन
कानों
से
हटा
दिल
पे
लगा
Sayeed Khan
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मैं
बहुत
ख़ुश
था
फिर
ख़बर
आई
लाश
दरिया
में
से
उभर
आई
Sayeed Khan
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क्या
करे
वो
जो
हो
गया
नाकाम
जिसने
सब
कुछ
तुझे
ही
था
जाना
Sayeed Khan
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वो
बहुत
ही
हसीन
है
तो
क्या
दिल
पे
मेरे
मकीन
है
तो
क्या
ज़िंदगी
ऐश
से
जिएँगे
हम
आख़िरी
मौत
सीन
है
तो
क्या
ख़ूब-सूरत
बदन
नहीं
उसका
वो
बहुत
ही
ज़हीन
है
तो
क्या
कौन
बोला
है
बोलने
को
सच
झूठ
पे
जब
यक़ीन
है
तो
क्या
इश्क़
तो
चाहता
बदन
है
बस
जब
बदन
अंगबीन
है
तो
क्या
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Sayeed Khan
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उसकी
आँचल
में
बिखर
जाते
हैं
तारें
जब
सँवरती
है
वो
मेरे
ख़्वाबों
जैसी
Sayeed Khan
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