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Satyam Bhaskar "Bulbul"
ik raaz se ha
ik raaz se ha | इक राज़ से हमें अनजाना बना रखा है
- Satyam Bhaskar "Bulbul"
इक
राज़
से
हमें
अनजाना
बना
रखा
है
उसने
तो
गैर
को
दीवाना
बना
रखा
है
वो
बात
जो
छुपानी
थी
सब
सेे
सच
कहूँ
तो
उसने
उसी
का
तो
अफसाना
बना
रखा
है
घर
मेरा
जैसे
मंदिर
था
उनके
साथ
बुलबुल
अब
उनके
बाद
घर
मयख़ाना
बना
रखा
है
- Satyam Bhaskar "Bulbul"
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ये
हक़ीक़त
है,
मज़हका
नहीं
है
वो
बहुत
दूर
है,
जुदा
नहीं
है
तेरे
होंटों
पे
रक़्स
करता
है
राज़
जो
अब
तलक
खुला
नहीं
है
जान
ए
जांँ
तेरे
हुस्न
के
आगे
ये
जो
शीशा
है,
आइना
नहीं
है
क्यूँ
शराबोर
हो
पसीने
में
मैं
ने
बोसा
अभी
लिया
नहीं
है
उस
का
पिंदार
भी
वहीं
का
वहीं
मेरे
लब
पर
भी
इल्तेजा
नहीं
है
जो
भी
होना
था
हो
चुका
काज़िम
अब
किसी
से
हमें
गिला
नहीं
है
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Kazim Rizvi
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अल्लाह
अल्लाह
हुस्न
की
ये
पर्दा-दारी
देखिए
भेद
जिस
ने
खोलना
चाहा
वो
दीवाना
हुआ
Arzoo Lakhnavi
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सोचकर
अब
शर्म
आती
है
ज़रा
चूम
लेना
होंठ
को
इज़हार
में
Neeraj Neer
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तू
ने
ये
क्या
ग़ज़ब
किया
मुझ
को
भी
फ़ाश
कर
दिया
मैं
ही
तो
एक
राज़
था
सीना-ए-काएनात
में
Allama Iqbal
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काबा
किस
मुँह
से
जाओगे
'ग़ालिब'
शर्म
तुम
को
मगर
नहीं
आती
Mirza Ghalib
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किसी
के
झूठ
से
पर्दा
हटाकर
हमारा
सच
बहुत
रोया
था
उस
दिन
Shadab Asghar
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रूहों
के
पर्दा-पोश
गुनाहों
से
बे-ख़बर
जिस्मों
की
नेकियाँ
ही
गिनाता
रहा
हूँ
मैं
Jaun Elia
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जवाँ
होने
लगे
जब
वो
तो
हम
से
कर
लिया
पर्दा
हया
यक-लख़्त
आई
और
शबाब
आहिस्ता
आहिस्ता
Ameer Minai
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ये
भँवरे
रौशनी
खो
देंगे
अपनी
आँखों
की
अगर
चमन
में
जो
कलियाँ
नक़ाब
ओढेंगी
Shajar Abbas
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न
तेरे
आने
से
मेरा
शबाब
लौटा
है
न
दिल
लगाने
से
मेरा
शबाब
लौटा
है
क़सम
ख़ुदा
की
बताता
हूँ
राज़
ये
तुमको
नहारी
खाने
से
मेरा
शबाब
लौटा
है
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Paplu Lucknawi
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उसके
बग़ैर
कैसे
काटें
तवील
ये
शब
प्यारे
सुनो
मेरी
इक
सिगरेट
ही
जलाओ
Satyam Bhaskar "Bulbul"
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जिस
लड़की
के
पीछे
पागल
है
दुनिया
सारी
वो
बैठे
मेरे
सिरहाने
गज़लें
सुनती
है
Satyam Bhaskar "Bulbul"
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इक
शख़्स
हाथ
जोड़े
खड़ा
हुआ
था
मेरे
आगे
लेकिन
जानाँ,
तेरे
बाद
किसी
के
नहीं
हुए
हम
Satyam Bhaskar "Bulbul"
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घर
मेरा
जैसे
मंदिर
था
उनके
साथ
बुलबुल
अब
उनके
बाद
घर
मय-ख़ाना
बना
रखा
है
Satyam Bhaskar "Bulbul"
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सुनते
नहीं
किसी
की
भी
अन-सुलझा
सा
ख़याल
हो
जो
ये
शराब
छोड़
दो
तो
आदमी
कमाल
हो
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Satyam Bhaskar "Bulbul"
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