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Sarul
dil-e-gham-gusta teri yaad se khaali har shaam
dil-e-gham-gusta teri yaad se khaali har shaam | दिल-ए-ग़म-गुस्ता तेरी याद से ख़ाली हर शाम
- Sarul
दिल-ए-ग़म-गुस्ता
तेरी
याद
से
ख़ाली
हर
शाम
भरती
जाती
है
मेरी
आँख
में
लाली
हर
शाम
- Sarul
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'मीर'
से
बैअत
की
है
तो
'इंशा'
मीर
की
बैअत
भी
है
ज़रूर
शाम
को
रो
रो
सुब्ह
करो
अब
सुब्ह
को
रो
रो
शाम
करो
Ibn E Insha
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अब
शहर
की
थकावट
बेचैन
कर
रही
है
अब
शाम
हो
गई
है
चल
माँ
से
बात
कर
लें
Akash Rajpoot
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फिर
आज
'अदम'
शाम
से
ग़मगीं
है
तबीअत
फिर
आज
सर-ए-शाम
मैं
कुछ
सोच
रहा
हूँ
Abdul Hamid Adam
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ज़ख़्म
है
दर्द
है
दवा
भी
है
जैसे
जंगल
है
रास्ता
भी
है
यूँँ
तो
वादे
हज़ार
करता
है
और
वो
शख़्स
भूलता
भी
है
हम
को
हर
सू
नज़र
भी
रखनी
है
और
तेरे
पास
बैठना
भी
है
यूँँ
भी
आता
नहीं
मुझे
रोना
और
मातम
की
इब्तिदा
भी
है
चूमने
हैं
पसंद
के
बादल
शाम
होते
ही
लौटना
भी
है
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Karan Sahar
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कभी
सहर
तो
कभी
शाम
ले
गया
मुझ
से
तुम्हारा
दर्द
कई
काम
ले
गया
मुझ
से
Farhat Abbas Shah
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हम
भी
गाँव
में
शाम
को
बैठा
करते
थे
हमको
भी
हालात
ने
बाहर
भेजा
है
Zahid Bashir
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शाम
को
जिस
वक़्त
ख़ाली
हाथ
घर
जाता
हूँ
मैं
मुस्कुरा
देते
हैं
बच्चे
और
मर
जाता
हूँ
मैं
Rajesh Reddy
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कोई
इशारा
दिलासा
न
कोई
वा'दा
मगर
जब
आई
शाम
तिरा
इंतिज़ार
करने
लगे
Waseem Barelvi
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कभी
तो
नस्ल-ओ-वतन-परस्ती
की
तीरगी
को
शिकस्त
होगी
कभी
तो
शाम-ए-अलम
मिटेगी
कभी
तो
सुब्ह-ए-ख़ुशी
मिलेगी
Abul mujahid zaid
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शाम
थी
हिज्र
की
हाल
मत
पूछना
आँख
थकने
लगे
तो
जिगर
रो
पड़े
Piyush Mishra 'Aab'
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एक
तितली
ने
इश्क़
कर
कर
के
गुल
की
आदत
ख़राब
कर
दी
है
Sarul
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वो
बस
बातों
से
ही
बहला
गया
है
समझ
में
माजरा
तो
आ
गया
है
उसे
सच
कहने
की
आदत
नहीं
है
जो
सच
पूछा
है
तो
घबरा
गया
है
इनायत
है
नहीं
आती
किसी
को
शिकायत
करना
सबको
आ
गया
है
मिला
था
जो
मुझे
बादे-सबा
सा
गया
तो
रक़्से-जानाँ
सा
गया
है
नई
दुनिया
का
मौसम
कुछ
अलग
है
ये
दिल
कुछ
ख़ुदस
उकता
सा
गया
है
बचाए
अब
ख़ुदा
इन
रहबरों
को
कि
क़ातिल
का
तरीक़ा
भा
गया
है
तमाशा
देखने
वालो
में
तुम
थे
तो
दिल
थोड़ा
सुकूँ
तो
पा
गया
है
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जंग-ए-दुनिया
में
खप
गए
लेकिन
फिर
भी
पीछे
नहीं
हटे
हम
लोग
घर
पे
साबुत
कहाँ
पहुँचते
हैं
देर
तक
काम
में
जुटे
हम
लोग
दूरियाँ
देख
कर
समझ
आया
कितने
ख़ानों
में
हैं
बटे
हम
लोग
घर
में
ताला
लगा
के
आए
थे
किसलिए
घर
को
लौटते
हम
लोग
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दिल
से
उसने
मुझे
निकाल
दिया
अब
मुझे
शा'इरी
में
रहने
दो
शे'र
तस्वीर
पर
लिखा
है
ना
हाँ
इसे
डायरी
में
रहने
दो
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बात
करती
थी
क्या
शराफ़त
से
उसकी
दिलकश
अदा
नदामत
से
फिर
से
उसका
यक़ीन
कर
भी
लिया
बाज़
आता
नहीं
हूँ
आदत
से
थी
शिकायत
मुझे
कि
तन्हा
हूँ
तंग
हूँ
अब
मैं
इस
शिकायत
से
ज़िंदगी
का
रहा
मलाल
बहुत
कुछ
बनाएँगे
अब
मलामत
से
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