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SALIM RAZA REWA
log kahte hain zaKHm gahra hai
log kahte hain zaKHm gahra hai | लोग कहते हैं ज़ख़्म गहरा है
- SALIM RAZA REWA
लोग
कहते
हैं
ज़ख़्म
गहरा
है
मुद्दतों
तक
ये
भर
नहीं
सकता
उनकी
आदत
है
यूँँ
डराने
की
मेरी
फ़ितरत
है
डर
नहीं
सकता
- SALIM RAZA REWA
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अँधेरे
भागते
हैं
दुम
दबाकर
उजालों
से
जो
मैंने
दोस्ती
की
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जिस
सेे
रौशन
मेरी
सुब्ह-ओ-शाम
है
मेरे
होटों
पे
फ़क़त
वो
नाम
है
इस
तरह
धड़कन
में
तेरा
नाम
है
जिस
तरह
राधा
के
दिल
में
श्याम
है
तू
मिला
मुझको
तो
सब
कुछ
मिल
गया
ये
मुक़द्दर
का
बड़ा
इनआम
है
हम
किसी
से
दुश्मनी
करते
नहीं
दोस्ती
तो
प्यार
का
पैग़ाम
है
दोस्ती
उस
सेे
मुनासिब
है
नहीं
शहर
की
गलियों
में
जो
बदनाम
है
लोग
कहते
हैं
बुरा
कहते
रहें
साफ़-गोई
ही
हमारा
काम
है
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कोई
इल्ज़ाम
लगाकर
मुझ
पर
अपने
हाथों
से
सज़ा
दे
मुझको
तेरा
हर
फ़ैसला
सर
आँखों
पर
ज़हर
दे
या
कि
दवा
दे
मुझको
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कौन
कहता
है
बस
नज़र
तक
है
वार
उनका
मेरे
जिगर
तक
है
मस्त
नज़रों
का
मय
जिधर
तक
है
ख़ूब-सूरत
फ़ज़ा
उधर
तक
है
चाँद
निकला
है
मेरे
आँगन
में
रौशनी
मेरे
बाम-ओ-दर
तक
है
चाँद
सूरज
चले
इशारे
से
उनके
क़ब्ज़े
में
तो
शजर
तक
है
ग़म
ख़ुशी
ज़िंदगी
में
हैं
शामिल
अब
निभाना
तो
उम्र
भर
तक
है
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रौनक़ें
नहीं
जातीं
मेरे
घर
के
आँगन
से
दिल
अगर
नहीं
बँटता
घर
बँटा
नहीं
होता
SALIM RAZA REWA
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