janaab-e-'meer ke lehje kii nazuki kii tarah | जनाब-ए-‘मीर’ के लहजे की नाज़ुकी की तरह 

  - SALIM RAZA REWA
जनाब-ए-‘मीर’केलहजेकीनाज़ुकीकीतरह
तुम्हारेलबहैंगुलाबोंकीपंखुड़ीकीतरह
शगुफ़्ताचेहरायेज़ुल्फ़ेंयेनर्गिसीआँखें
तेराहसीनतसव्वुरहैशा'इरीकीतरह
तुम्हारेआनेसेहर-सूख़ुशीबरसतीहै
अँधेरीरातचमकतीहैचाँदनीकीतरह
यूँँहीबज़्मसेतारीकियाँहुईंग़ाएब
कोईकोईतोआयाहैरौशनीकीतरह
यहीख़ुदासदु'आमाँगताहूँरातोदिन
किमैंभीजीलूॅंज़मानेमेंआदमीकीतरह
  - SALIM RAZA REWA
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