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SALIM RAZA REWA
ishq ka jaam pila de mujhko
ishq ka jaam pila de mujhko | इश्क़ का जाम पिला दे मुझको
- SALIM RAZA REWA
इश्क़
का
जाम
पिला
दे
मुझको
और
बीमार
बना
दे
मुझको
ख़ुशनुमा
रंग
ये
दिलकश
बातें
तेरी
आदत
न
लगा
दे
मुझको
अपनी
उल्फ़त
से
बचा
ले
या
फिर
अपनी
नफ़रत
से
मिटा
दे
मुझको
कोई
इल्ज़ाम
लगाकर
मुझ
पर
अपने
हाथों
से
सज़ा
दे
मुझको
तेरा
हर
फ़ैसला
सर
आँखों
पर
ज़हर
दे
या
कि
दवा
दे
मुझको
सारी
दुनिया
से
अलग
हो
जाऊँ
ख़्वाब
इतने
न
दिखा
दे
मुझको
- SALIM RAZA REWA
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तसव्वुर
में
भी
अब
वो
बे-नक़ाब
आते
नहीं
मुझ
तक
क़यामत
आ
चुकी
है
लोग
कहते
हैं
शबाब
आया
Hafeez Jalandhari
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बढ़
के
इम्कान
से
नुक़्सान
उठाए
हुए
हैं
हम
मुहब्बत
में
बहुत
नाम
कमाए
हुए
हैं
मेरे
मौला
मुझे
ता'बीर
की
दौलत
दे
दे
मैंने
इक
शख़्स
को
कुछ
ख़्वाब
दिखाए
हुए
हैं
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Ejaz Tawakkal Khan
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हर
एक
शख़्स
यहाँ
महव-ए-ख़्वाब
लगता
है
किसी
ने
हम
को
जगाया
नहीं
बहुत
दिन
से
Azhar Iqbal
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हमको
हमारी
नींद
भी
वापस
नहीं
मिली
लोगों
को
उनके
ख़्वाब
जगा
कर
दिए
गए
Imran Aami
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ये
आरज़ू
भी
बड़ी
चीज़
है
मगर
हमदम
विसाल-ए-यार
फ़क़त
आरज़ू
की
बात
नहीं
Faiz Ahmad Faiz
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ख़्वाब
इतना
भी
हसीं
मत
देखो
नींद
टूटे
तो
न
ये
शब
गुज़रे
anupam shah
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जब
भी
कश्ती
मिरी
सैलाब
में
आ
जाती
है
माँ
दु'आ
करती
हुई
ख़्वाब
में
आ
जाती
है
Munawwar Rana
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ग़म-ए-ज़माना
ने
मजबूर
कर
दिया
वर्ना
ये
आरज़ू
थी
कि
बस
तेरी
आरज़ू
करते
Akhtar Shirani
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ऐसा
है
कि
सब
ख़्वाब
मुसलसल
नहीं
होते
जो
आज
तो
होते
हैं
मगर
कल
नहीं
होते
Ahmad Faraz
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कुछ
इस
लिए
भी
तेरी
आरज़ू
नहीं
है
मुझे
मैं
चाहता
हूँ
मेरा
इश्क़
जावेदानी
हो
Vipul Kumar
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तेरे
ही
प्यार
की
ख़ुशबू
हमेशा
साथ
रहती
है
तेरी
यादों
के
लश्कर
ने
कभी
तन्हा
नहीं
छोड़ा
SALIM RAZA REWA
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ख़ूब
जी
भर
सता
लिया
जाए
और
रोने
नहीं
दिया
जाए
सिसकियाँ
हो
रही
हैं
कुछ
मध्यम
दर्द
को
ज़ख़्म
दे
दिया
जाए
ख़र्च
करके
ख़ुशी
के
कुछ
लम्हे
ग़म
को
पागल
बना
दिया
जाए
मशवरा
है
उदास
लम्हों
को
मौत
का
हुक्म
दे
दिया
जाए
मुह
उठाती
हैं
ख़्वाहिशें
इनको
एक
तमाचा
लगा
दिया
जाए
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SALIM RAZA REWA
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तेरे
दीदार
से
आँखों
को
सुकूँ
मिलता
है
ख़ुद
से
कर-कर
के
कई
बार
बहाने
आए
SALIM RAZA REWA
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जिन
जिन
पे
इनायत
है
जिन
जिन
से
मोहब्बत
है
उन
चाहने
वालों
में
मेरा
भी
शुमार
आए
फूलों
को
सजाया
है
पलकों
को
बिछाया
है
ऐ
बाद-ए-सबा
कह
दे
अब
जान-ए-बहार
आए
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SALIM RAZA REWA
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अपनी
ज़ुल्फों
को
धो
रही
है
शब
और
ख़ुश्बू
निचो
रही
है
शब
मेरे
ख़्वाबों
की
ओढ़कर
चादर
मेरे
बिस्तर
पे
सो
रही
है
शब
अब
अँधेरों
से
जंग
की
ख़ातिर
कुछ
चराग़ों
को
बो
रही
है
शब
सुब्ह-ए-नौ
के
क़रीब
आते
ही
अपना
अस्तित्व
खो
रही
है
शब
दिन
के
सदमों
को
सह
रहा
है
दिन
रात
का
बोझ
ढो
रही
है
शब
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SALIM RAZA REWA
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