कहीं वो चेहरा-ए-ज़ेबा नज़र नहीं आया

  - Sahar Ansari
कहींवोचेहरा-ए-ज़ेबानज़रनहींआया
गयावोशख़्सतोफिरलौटकरनहींआया
कहूँतोकिससेकहूँकेअबसर-ए-मंज़िल
सफ़रतमामहुआहम-सफ़रनहींआया
मैंवोमुसाफ़िर-ए-दश्त-ए-ग़म-ए-मोहब्बतहूँ
जोघरपहुँचकेभीसोचेकिघरनहींआया
सबानेफ़ाशकियाराज़-ए-बू-ए-गेसू-ए-यार
येजुर्मअहल-ए-तमन्नाकेसरनहींआया
कभीकोईतेरेवादोंकातज़्किराछेड़े
तोक्याकहूँकिकोईनामा-बरनहींआया
फिरएकख़्वाब-ए-वफ़ाभररहाहैआँखोंमें
येरंगहिज्रकीशबजागकरनहींआया
मेरेलहूकोमेरीख़ाक-ए-नागुज़ीरकोदेख
यूँँहीसलीक़ा-ए-अर्ज़-ए-हुनरनहींआया
जानेज़ब्तकेहाथों'सहर'पेक्यागुज़री
बहुतदिनोंसेवोआशुफ़्ता-सरनहींआया
  - Sahar Ansari
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