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Rizwan Khoja "Kalp"
ped gin kaatee thii raahen
ped gin kaatee thii raahen | पेड़ गिन काटी थी राहें
- Rizwan Khoja "Kalp"
पेड़
गिन
काटी
थी
राहें
ख़र्च
गिन
कर
कट
रही
है
- Rizwan Khoja "Kalp"
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यूँँ
ही
हमेशा
उलझती
रही
है
ज़ुल्म
से
ख़ल्क़
न
उनकी
रस्म
नई
है,
न
अपनी
रीत
नई
यूँँ
ही
हमेशा
खिलाए
हैं
हमने
आग
में
फूल
न
उनकी
हार
नई
है,
न
अपनी
जीत
नई
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Faiz Ahmad Faiz
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सफ़र
पीछे
की
जानिब
है
क़दम
आगे
है
मेरा
मैं
बूढ़ा
होता
जाता
हूँ
जवाँ
होने
की
ख़ातिर
Zafar Iqbal
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सुखाई
जा
रही
है
जुल्फ़
धोकर
घटा
या'नी
निचोड़ी
जा
रही
है
Satya Prakash Soni
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आ
रही
है
जो
बहू
सीधी
रहे
माँ
चाहती
जा
रही
बेटी
मगर
चालाक
होनी
चाहिए
Tanoj Dadhich
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दिल
की
तमन्ना
थी
मस्ती
में
मंज़िल
से
भी
दूर
निकलते
अपना
भी
कोई
साथी
होता
हम
भी
बहकते
चलते
चलते
Majrooh Sultanpuri
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मंज़िल
पे
न
पहुँचे
उसे
रस्ता
नहीं
कहते
दो
चार
क़दम
चलने
को
चलना
नहीं
कहते
इक
हम
हैं
कि
ग़ैरों
को
भी
कह
देते
हैं
अपना
इक
तुम
हो
कि
अपनों
को
भी
अपना
नहीं
कहते
कम-हिम्मती
ख़तरा
है
समुंदर
के
सफ़र
में
तूफ़ान
को
हम
दोस्तो
ख़तरा
नहीं
कहते
बन
जाए
अगर
बात
तो
सब
कहते
हैं
क्या
क्या
और
बात
बिगड़
जाए
तो
क्या
क्या
नहीं
कहते
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Nawaz Deobandi
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'अंजुम'
तुम्हारा
शहर
जिधर
है
उसी
तरफ़
इक
रेल
जा
रही
थी
कि
तुम
याद
आ
गए
Anjum Rehbar
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बर्बाद
कर
दिया
हमें
परदेस
ने
मगर
माँ
सब
से
कह
रही
है
कि
बेटा
मज़े
में
है
Munawwar Rana
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बंद
कमरे
में
हज़ारों
मील
अब
चलते
हैं
हम
काफ़ी
महँगी
पड़
रही
है
शा'इरी
से
दोस्ती
Ashraf Jahangeer
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वो
आँखें
चुप
थीं
लेकिन
हँस
रही
थीं
मेरा
जी
कर
रहा
था
चूम
लूँ
अब
Ritesh Rajwada
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गुलशन
मिले
चुनने
बहुत
से
ख़ार
में
डूबा
दिल-ए-नादाँ
तिरे
ही
प्यार
में
अपनी
जवानी
में
कमाने
आ
गया
मिलता
हूँ
अपने
गाँव
से
अख़बार
में
ओछा
तिरा
लगने
लगा
रंग-ए-जहाँ
रंगों
का
कारोबार
देखा
यार
में
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Rizwan Khoja "Kalp"
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ओछा
तेरा
लगने
लगा
रंग-ए-जहाँ
रंगो
का
कारोबार
देखा
यार
में
Rizwan Khoja "Kalp"
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इश्क़
कर
के
रोज़
उस
में
तू
जला
कर
कोई
मंज़िल
ही
नहीं
बस
तू
चला
कर
सोचता
हूँ
दर्द
अपने
फूँक
डालूँ
जिस्म
तेरा
सर्द
रातों
में
जला
कर
साहिब-ए-मसनद
ग़ुलामी
चाहते
हैं
शाह
वाले
सर
झुका
के
अब
चला
कर
रौशनी
मत
कर
चराग़ों
के
सहारे
कर
उजाला
नूर-ए-ईमाँ
को
जला
कर
लोग
चाहे
ज़ुल्म
बरपाए
तुझी
पर
मुस्कुरा
के
उन
सभी
का
तू
भला
कर
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Rizwan Khoja "Kalp"
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रौशन
नज़र
आता
है
मजलिसों
में
वो
शख़्स
रातों
का
जला
हुआ
है
Rizwan Khoja "Kalp"
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माह
यूँँ
ही
गुज़रता
तिरी
याद
में
ईद
के
चाँद
सी
है
मुहब्बत
तिरी
Rizwan Khoja "Kalp"
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