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Ritesh kumar
yaaden
yaaden | "यादें"
- Ritesh kumar
"यादें"
आज
फिर
याद
आए
वो
कुछ
याद
पुराने
अब
क्या
ही
कहें
कि
कितने
हैं
प्यारे
जैसे
दिखते
है
आसमाँ
में
वो
चाँद-सितारे
समझ
लो
कुछ
वैसे
ही
प्यारे
वैसे
ही
न्यारे
वो
बचपन
की
रेल
वो
बचपन
के
खेल
चाहे
वो
लुका-छिपी
या
फिर
हो
साथ
में
वो
पकड़म-पकड़ाई
पर
क्या
करें
सब
तो
बन
कर
रह
गई
हैं
बस
यादें
याद
आई
वो
इक
बात
जिस
सेे
होती
है
आँखों
में
बरसात
वो
पापा
की
डाँट
और
मनाना
भी
साथ
जिस
सेे
हम
जाते
थे
डर
फिर
हम
ढूँढने
थे
लगते
माँ
का
वो
आँचल
जिस
में
थे
हम
महफ़ूज
फिर
हम
देखते
थे
दूर
से
ही
छिप
कर
और
भी
हैं
बहुत
सी
बातें
पर
क्या
करें
सब
तो
बन
कर
रह
गई
हैं
बस
यादें
- Ritesh kumar
ये
जो
दीवार
अँधेरों
ने
उठा
रक्खी
है
मेरा
मक़्सद
इसी
दीवार
में
दर
करना
है
Azm Shakri
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फ़ुर्सत
नहीं
मुझे
कि
करूँँ
इश्क़
फिर
से
अब
माज़ी
की
चोटों
से
अभी
उभरा
नहीं
हूँ
मैं
डर
है
कहीं
ये
ऐब
उसे
रुस्वा
कर
न
दे
सो
ग़म
में
भी
शराब
को
छूता
नहीं
हूँ
मैं
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Harsh saxena
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रातें
किसी
याद
में
कटती
हैं
और
दिन
दफ़्तर
खा
जाता
है
दिल
जीने
पर
माएल
होता
है
तो
मौत
का
डर
खा
जाता
है
सच
पूछो
तो
'तहज़ीब
हाफ़ी'
मैं
ऐसे
दोस्त
से
आज़िज़
हूँ
मिलता
है
तो
बात
नहीं
करता
और
फोन
पे
सर
खा
जाता
है
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Tehzeeb Hafi
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मैं
बार
बार
तुझे
देखता
हूॅं
इस
डर
से
कि
पिछली
बार
का
देखा
हुआ
ख़राब
न
हो
Shaheen Abbas
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हमारे
जैसा
कोई
दर-ब-दर
नहीं
होगा
कहीं
पे
होगा
भी
तो
इस
कदर
नहीं
होगा
निकल
गया
हूँ
क़ज़ा
के
परे
तो
मैं
कबका
दे
जहर
भी
कोई
तो
अब
असर
नहीं
होगा
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Aadi Ratnam
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मैं
कैसे
मान
लूँ
कि
इश्क़
बस
इक
बार
होता
है
तुझे
जितनी
दफ़ा
देखूँ
मुझे
हर
बार
होता
है
तुझे
पाने
की
हसरत
और
डर
ना-कामियाबी
का
इन्हीं
दो
तीन
बातों
से
ये
दिल
दो
चार
होता
है
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Bhaskar Shukla
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कहीं
से
दुख
तो
कहीं
से
घुटन
उठा
लाए
कहाँ-कहाँ
से
न
दीवानापन
उठा
लाए
अजीब
ख़्वाब
था
देखा
के
दर-ब-दर
हो
कर
हम
अपने
मुल्क
से
अपना
वतन
उठा
लाए
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Farhat Abbas Shah
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शग़्ल
था
दश्त-नवर्दी
का
कभी
ऐ
'ताबाँ'
अब
गुलिस्ताँ
में
भी
जाते
हुए
डर
लगता
है
Anwar Taban
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डर
हम
को
भी
लगता
है
रस्ते
के
सन्नाटे
से
लेकिन
एक
सफ़र
पर
ऐ
दिल
अब
जाना
तो
होगा
Javed Akhtar
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मुसाफ़िरों
के
दिमाग़ों
में
डर
ज़ियादा
है
न
जाने
वक़्त
है
कम
या
सफ़र
ज़ियादा
है
Hashim Raza Jalalpuri
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